गोल्ड की कीमतें **3 महीने** के उच्चतम स्तर के करीब होने के बावजूद भारतीय परिवारों ने इसे बेचने के बजाय अपने पास सुरक्षित रखने का फैसला किया है। राखी जैसे त्योहारों पर भी प्रॉफिट-बुकिंग का चलन धीमा दिख रहा है, जिसका सीधा असर गोल्ड रिसाइकिलर्स और लोन देने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है।
बाजार में 'वेट एंड वॉच' का दौर
आमतौर पर जब बुलियन प्राइसेज रिकॉर्ड स्तर पर होते हैं, तो निवेशक अपना मुनाफा बुक करने के लिए गहने या सिक्के बेचते हैं। लेकिन इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त के दौरान रिटेल मार्केट पूरी तरह से शांत रहा। रक्षा बंधन जैसे बड़े त्योहार पर भी बिक्री में वह तेजी नहीं दिखी जिसकी उम्मीद की जा रही थी। उपभोक्ता अब सोने को ग्लोबल आर्थिक अनिश्चितता के खिलाफ एक लॉन्ग-टर्म सुरक्षा के रूप में देख रहे हैं।
बैंकों और NBFCs पर असर
सोने की इस 'होर्डिंग' (जमाखोरी) से गोल्ड फाइनेंस सेक्टर के लिए चुनौती बढ़ गई है। गोल्ड रिसाइकिलिंग कंपनियां अपनी सप्लाई चेन बनाए रखने के लिए पुराने सोने के इनफ्लो पर निर्भर रहती हैं। इसके अलावा, जो कंपनियां गोल्ड लोन देती हैं, उनके लिए भी यह एक चिंता का विषय है। अगर लोग सोना बेचना या गिरवी रखना कम कर देंगे, तो बैंकों और NBFCs के गोल्ड लोन पोर्टफोलियो की ग्रोथ धीमी पड़ सकती है।
आगे की राह
अब सबकी नजरें मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर टिकी हैं। अगर सोने के दाम और ऊपर जाते हैं, तो यह फिजिकल डिमांड पर बड़ा असर डाल सकता है। निवेशकों को अब आने वाले फेस्टिव सीजन का इंतजार है, ताकि यह पता चल सके कि क्या लिक्विडिटी की जरूरत लोगों को सोना बेचने पर मजबूर करेगी, या फिर यह होल्डिंग ट्रेंड बरकरार रहेगा। इसके अलावा, US फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों वाली नीतियां भी आगे चलकर डॉलर की मजबूती और सोने की कीमतों को तय करेंगी।
