भारत में कपास की कीमतों में इन दिनों तेजी देखने को मिल रही है। इसकी मुख्य वजह बुआई के रकबे में आई **15%** की कमी और स्पिनिंग मिल्स की ओर से बढ़ती मांग है। देश में अब तक **79.54 लाख हेक्टेयर** में बुआई हुई है, वहीं अनियमित बारिश की चिंताओं ने बाजार में सप्लाई को और टाइट कर दिया है।
सप्लाई टाइट, कीमतों में उछाल
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 10 जुलाई तक कपास की बुआई 79.54 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल इसी अवधि के 93.95 लाख हेक्टेयर की तुलना में 15% कम है। यह गिरावट मुख्य रूप से कई अहम इलाकों में बारिश की कमी के कारण आई है, जिससे आने वाली फसल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
बाजार पर असर और सप्लाई की स्थिति
इन हालातों को देखते हुए, कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने पिछले दो दिनों में ₹800 प्रति कैंडी (356 किलो) की दर से कीमतें बढ़ा दी हैं। बाजार में सप्लाई कम होने के कारण मल्टीनेशनल ट्रेडिंग फर्म CCI की कीमतों से करीब ₹1,000 प्रति कैंडी प्रीमियम पर माल बेच रही हैं। ग्लोबल मार्केट में भी न्यूयॉर्क कॉटन फ्यूचर्स 75-76 सेंट प्रति पाउंड के स्तर से बढ़कर 81-82 सेंट के करीब पहुंच गए हैं।
स्पिनिंग मिल्स के लिए यह माहौल इनपुट कॉस्ट को मैनेज करने में एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। कई मिल्स फिलहाल ₹64,000 के आसपास अपनी जरूरत का कपास खरीद रही हैं, ताकि वे साल के अंत तक अपनी औसत खरीद लागत को काबू में रख सकें।
आगे का आउटलुक और सेक्टर का भविष्य
हालांकि, इस साल बुआई रकबा पिछले साल से कम है, लेकिन इंडस्ट्री का अनुमान है कि सीजन आगे बढ़ने के साथ बुआई में सुधार होगा। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रतिनिधियों का कहना है कि बुआई गतिविधियां अक्सर अलग-अलग समय पर होती हैं, और उम्मीद है कि कुल कवरेज में सुधार होगा। कुछ इंडस्ट्री अनुमानों के अनुसार, दक्षिण भारत में बुआई 20% बढ़ने के कारण कुल बुआई 125-130 लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकती है।
बाजार के लिए एक अहम बात यह है कि हाई-क्वालिटी कपास की उपलब्धता अभी भी कम है, क्योंकि टॉप-टियर स्टॉक ज्यादातर CCI और बड़े मल्टीनेशनल ट्रेडर्स के पास है।
निवेशकों को कर्नाटक और तेलंगाना जैसे कपास उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की प्रगति पर नजर रखनी चाहिए। अच्छी बारिश पैदावार के अनुमानों को सही साबित करने के लिए महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा, अगर मिल्स बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो टेक्सटाइल निर्माताओं के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। बाजार की नजर 7,000-8,000 गांठों तक गिरी दैनिक आवक (arrivals) पर भी रहेगी, साथ ही कॉटन यार्न की एक्सपोर्ट डिमांड में होने वाले उतार-चढ़ाव पर भी ध्यान दिया जाएगा।
