घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतें घटकर **₹64,500 से ₹65,500** प्रति कैंडी के स्तर पर आ गई हैं। सीजनल अराइवल में बढ़ोतरी और ग्लोबल संकेतों के बीच यह गिरावट भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों के लिए मार्जिन सुधारने का एक बड़ा मौका बन सकती है।
भारत में कॉटन के भावों में आई गिरावट से टेक्सटाइल सेक्टर में हलचल है। एक समय कॉटन की कीमतें ₹70,000 प्रति कैंडी के ऊपरी स्तर पर थीं, जो अब घटकर ₹64,500 से ₹65,500 के दायरे में आ गई हैं। इस बदलाव के पीछे मुख्य वजह ग्लोबल मार्केट का सुस्त रुख और नई फसल का मंडियों में पहुंचना है। इंटरनेशनल मार्केट में भी ICE फ्यूचर्स में अगस्त के बाद से लगातार नरमी देखी गई है।
टेक्सटाइल शेयरों पर क्या होगा असर?
Vardhman Textiles, Trident Limited और Nitin Spinners जैसी कंपनियों के लिए कॉटन एक प्राइमरी रॉ मटेरियल (Raw Material) है। जब इनपुट कॉस्ट कम होती है, तो कंपनियों के पास अपने प्रॉफिट मार्जिन को बेहतर करने का मौका होता है। निवेशक अब इन कंपनियों के आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या ये कंपनियां इस सस्ते रॉ मटेरियल का लाभ उठा पाती हैं।
सप्लाई और डिमांड का गणित
फिलहाल, स्पिनिंग मिलों के पास अगले 1 से 2 महीने का स्टॉक मौजूद है, इसलिए वे अभी आक्रामक खरीदारी से बच रही हैं। अक्टूबर में नई फसल की आवक और बढ़ने की उम्मीद है, जिससे कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
क्या है बड़ा जोखिम?
हालांकि दाम कम हुए हैं, लेकिन सप्लाई साइड पर चिंताएं अभी खत्म नहीं हुई हैं। मानसून की असमान बारिश के कारण इस साल कॉटन की पैदावार में पिछले साल के मुकाबले 10% की कमी आने की संभावना जताई जा रही है। अगर फसल का अनुमान कम रहता है, तो सीजन के आगे बढ़ने पर सप्लाई की कमी कीमतों को फिर से ऊपर खींच सकती है। ऐसे में निवेशकों को सिर्फ रॉ मटेरियल की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट डिमांड और कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर भी बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
