भारतीय कॉपर कंपनियां सरकार से GST रेट को **18%** से घटाकर **5%** करने की मांग कर रही हैं। इससे कंपनियों का **$3.6 बिलियन** का वर्किंग कैपिटल ब्लॉक होने से बच सकेगा। लंदन मेटल एक्सचेंज पर कॉपर की रिकॉर्ड कीमतों के कारण कंपनियां लिक्विडिटी के दबाव से जूझ रही हैं।
टैक्स का बोझ और लिक्विडिटी का संकट
कॉपर कंपनियों के लिए मौजूदा टैक्स स्ट्रक्चर एक बड़ी मुसीबत बन गया है। कच्चे माल की खरीद पर शुरुआत में ही 18% टैक्स देना पड़ता है, और क्योंकि प्रॉसेसिंग में लंबा समय लगता है, इसलिए कंपनियों की भारी नकदी लंबे समय तक फंसी रहती है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, इस सेक्टर की लगभग $3.6 बिलियन की पूंजी वर्किंग कैपिटल के तौर पर अटकी हुई है। Hindalco Industries जैसी दिग्गज कंपनियां भी इस भारी टैक्स बोझ के बीच अपने ऑपरेशंस को मैनेज करने में चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
ग्लोबल मार्केट और सप्लाई चेन पर असर
लंदन मेटल एक्सचेंज पर कॉपर की कीमतें $14,700 प्रति टन के पार पहुंच गई हैं। इस महंगाई और ऊंचे टैक्स के कारण कंपनियों ने अपना इन्वेंट्री लेवल काफी घटा दिया है। पहले जहां कंपनियां हफ्तों का स्टॉक रखती थीं, अब यह घटकर कुछ दिनों का रह गया है। यह 'लीन इन्वेंट्री मॉडल' सप्लाई चेन को काफी नाजुक बना रहा है, जिससे मामूली देरी भी प्रोडक्शन ठप कर सकती है।
बदलता हुआ सेक्टर स्ट्रक्चर
साल 2018 में Vedanta के Sterlite प्लांट के बंद होने के बाद से भारत का कॉपर सेक्टर इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भर हो गया है। ग्लोबल मार्केट की वोलाटिलिटी और टैक्स की पेचीदगियों ने कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल बना दिया है।
निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मांग पर क्या फैसला लेती है। अगर GST में कटौती होती है, तो कंपनियों के पास एक्सपेंशन और ऑपरेशनल एफिशिएंसी के लिए ज्यादा फंड उपलब्ध होगा। वहीं, अगर मौजूदा स्ट्रक्चर जारी रहता है, तो कंपनियों को सीमित वर्किंग कैपिटल के साथ ही काम चलाना पड़ेगा, जिसका सीधा असर उनके मार्जिन और भविष्य की ग्रोथ योजनाओं पर पड़ सकता है।
