क्यों मचा है बाज़ार में हाहाकार?
भारत का पारंपरिक बुलियन सप्लाई चेन (Bullion Supply Chain) सोने और चांदी के बाज़ारों में आई अभूतपूर्व प्राइस वोलेटिलिटी (Price Volatility) का सीधा नतीजा है। जो सिस्टम कभी भरोसे और उधारी (Credit) पर चलता था, अब भारी पेमेंट डिले (Payment Delay) और कई फर्मों के दिवालिया (Insolvency) होने से जूझ रहा है। इससे बाज़ार के काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। बड़े होलसेलर्स (Wholesalers) ने नए ऑर्डर देना बंद कर दिया है, मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) को कच्चे माल की बढ़ती लागतों का सामना करना पड़ रहा है, और ग्राहक भी बढ़ती कीमतों के कारण खरीदारी से कतरा रहे हैं। नतीजा यह है कि सोने-चांदी की डिमांड (Demand) में भारी कमी आई है, चाहे वह निवेश के लिए हो या गहनों के लिए।
राजकोट का बुरा हाल, 44 फर्में दिवालिया
एशिया के सबसे बड़े चांदी व्यापार केंद्रों में से एक, राजकोट, इस संकट का जीता-जागता उदाहरण है। जो ट्रेडर (Trader) पहले हर महीने 25-30 टन चांदी का कारोबार करते थे, वे अब मुश्किल से एक टन बेच पा रहे हैं। इसका सीधा असर करीब 1.5 लाख (1.5 lakh) मजदूरों की नौकरियों पर पड़ा है, जिन्हें बड़े पैमाने पर निकाला जा रहा है। वित्तीय नुकसान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ राजकोट में 44 ट्रेडिंग फर्में दिवालिया होने की कगार पर हैं, जिन पर कुल मिलाकर लगभग ₹3,500 करोड़ का अनसेटल्ड ड्यूज (Unsettled Dues) यानी बकाया देनदारी है। यह संकट सप्लाई चेन में और भी नीचे तक फैल रहा है, क्योंकि पेमेंट में हो रही देरी की वजह से उधारी पर चलने वाला पारंपरिक मॉडल टिकाऊ नहीं रह गया है। एक ही दिन में ₹30,000 का प्राइस जंप (Price Jump) पेमेंट में देरी को एक बड़ा वित्तीय बोझ बना देता है। बाज़ार अब अनुमान लगाने वाले जुए (Speculative Gambling) में बदल गया है।
इंडस्ट्रियल डिमांड ने बढ़ाई अस्थिरता
2025 में चांदी की कीमत में करीब 160% की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई, जिसकी शुरुआत AI, सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे तेज़ी से बढ़ते सेक्टर्स से इंडस्ट्रियल डिमांड (Industrial Demand) के कारण हुई। इस डिमांड के साथ-साथ चीन के एक्सपोर्ट कंट्रोल (Export Controls) और अमेरिका द्वारा चांदी को एक 'क्रिटिकल मिनरल' (Critical Mineral) का दर्जा देने जैसी वैश्विक चिंताओं ने एक अस्थिर माहौल बना दिया है, जिसे घरेलू ट्रेडर्स और मैन्युफैक्चरर्स संभाल नहीं पा रहे हैं। अमेरिका द्वारा चांदी को क्रिटिकल मिनरल घोषित करना, इसकी रणनीतिक अहमियत को दिखाता है, जो सोने के मुकाबले सिर्फ एक सुरक्षित संपत्ति (Safe-haven) से कहीं बढ़कर है। इस दोहरी भूमिका (सुरक्षित संपत्ति और औद्योगिक ज़रूरत) के कारण इसकी कीमतों में और भी ज्यादा उतार-चढ़ाव आ रहा है। 1 जनवरी 2026 से चीन द्वारा लागू की गई लाइसेंस-आधारित एक्सपोर्ट सिस्टम (License-based export system) ने अनिश्चितता की एक और परत जोड़ दी है, जिससे वैश्विक सप्लाई टाइट हो सकती है और कीमतों में और इजाफा हो सकता है।
बाज़ार का विश्लेषण: ₹4 लाख से ₹2.61 लाख तक का सफर
सोने और चांदी, जिन्हें भारत में हमेशा से एक सुरक्षित वित्तीय सहारा माना जाता रहा है, वे अब अनिश्चितता के स्रोत बन गए हैं। 2026 की शुरुआत में ₹4 लाख प्रति किलोग्राम के करीब पहुंचने वाली चांदी की कीमतों में एक ही दिन में ₹15,000 तक का उतार-चढ़ाव देखा गया, जो पहले के ₹4,000-5,000 के साप्ताहिक उतार-चढ़ाव से बिल्कुल अलग है। 9 फरवरी 2026 तक कीमतें घटकर लगभग ₹2.61 लाख प्रति किलोग्राम पर आ गई हैं, लेकिन बाज़ार की अस्थिरता अभी भी बनी हुई है। इस अस्थिरता ने डिमांड के पैटर्न को भी बिगाड़ दिया है। इन्वेस्टमेंट बाइंग (Investment Buying) बढ़ी है, लेकिन गहनों के लिए कंजम्पशन (Consumption) कमजोर हुआ है। 2025 में भारत में सोने की इन्वेस्टमेंट डिमांड वैल्यू (Value) के हिसाब से बढ़ी, लेकिन गहनों की कुल मात्रा (Volume) में भारी गिरावट आई, जो यह दिखाता है कि महंगाई के कारण लोग गहने खरीदने की बजाय निवेश को तरजीह दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर, 9 फरवरी 2026 तक सोने की कीमतें लगभग $5,034 प्रति औंस (Ounce) और चांदी की कीमतें $81 प्रति औंस के आसपास थीं। हालांकि, सोलर, EV और डेटा सेंटर जैसे सेक्टर्स से भविष्य में चांदी की इंडस्ट्रियल डिमांड बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन मौजूदा मार्केट कंडीशन मैन्युफैक्चरर्स और ग्राहकों, दोनों के लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। भारतीय कीमती धातु बाज़ार में ज़बरदस्त ग्रोथ की उम्मीद है, खासकर चांदी सेगमेंट में, लेकिन फिलहाल यह ग्रोथ भारी प्राइस अस्थिरता के सामने कमजोर पड़ गई है।
गिरावट का अनुमान (Bear Case)
फिलहाल बाज़ार में जो उथल-पुथल मची है, वह भारत के बुलियन इकोसिस्टम (Bullion Ecosystem) की कमजोरियों को उजागर कर रही है। खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) के लिए भरोसे और उधारी पर निर्भरता, कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के सामने नाकाफी साबित हुई है। इस वोलेटिलिटी ने लिक्विडिटी (Liquidity) का संकट पैदा कर दिया है। नितिन पटेल जैसे लोग चांदी की बार्स को सही दाम पर बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। साथ ही, कच्चे माल की ऊंची लागत और कीमतों में तेजी से गिरावट के कारण मौजूदा इन्वेंटरी (Inventory) पर लगे भारी नुकसान ने इसे मैनेजमेंट को एक अनुमान लगाने वाले खेल (Speculation) जैसा बना दिया है। चीन के एक्सपोर्ट कंट्रोल और वैश्विक कारकों से बढ़ी हुई फिजिकल और पेपर कीमतों के बीच का अंतर पारदर्शिता को और कम कर रहा है। यहां तक कि कीमतों में गिरावट के बाद भी ग्राहकों का गहने न खरीद पाना यह दिखाता है कि सामर्थ्य (Affordability) का स्तर बदल गया है, जिससे गहनों की डिमांड में लंबे समय तक मंदी रह सकती है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी बेस्सेंट द्वारा बताई गई सट्टेबाजी (Speculative Blow-off), जिसमें कुछ हद तक चीनी ट्रेडर्स का हाथ बताया जा रहा है, यह संकेत देती है कि बाज़ार फंडामेंटल वैल्यू (Fundamental Value) से हट गया है और आगे गिरावट की संभावना है।
भविष्य की राह
विश्लेषकों को उम्मीद है कि इंडस्ट्रियल डिमांड और सट्टेबाजी की गतिविधि के बीच चांदी में अस्थिरता जारी रहेगी, जबकि सोना सुरक्षित निवेश (Safe-haven) की मांग और सेंट्रल बैंक की खरीदारी से सहारा पा सकता है। हालांकि, भारतीय कीमती धातु व्यापार का तात्कालिक भविष्य स्थिरता (Stability) की वापसी पर निर्भर करता है। अगर कीमतों में पूर्वानुमान (Predictable pricing) नहीं रहेगा, तो सप्लाई चेन, रोज़गार और ग्राहकों के भरोसे को जो नुकसान हुआ है, उसके लंबे समय तक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। निवेशक और ट्रेडर अब सिर्फ कीमत की दिशा पर नहीं, बल्कि उस स्थिरता की तलाश में हैं, जिसके बिना यह बाज़ार इन दिनों अत्यधिक, अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव का पर्याय बन गया है।