भारतीय एक्टिवेटेड कार्बन एक्सपोर्टर्स के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। देश के कई बैंक रूस और सूडान को भेजे जा रहे माल की पेमेंट पर रोक लगा रहे हैं। इस वजह से सालाना लगभग **45,000 टन** के व्यापार पर खतरा मंडराने लगा है।
क्यों रुक रहा है पेमेंट?
बैंकों का कहना है कि वे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों (International Sanctions) का सख्ती से पालन कर रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने रूस और सूडान के साथ व्यापार पर कोई आधिकारिक बैन नहीं लगाया है। इसके बावजूद, बैंक इन देशों से होने वाले ट्रांजैक्शन को या तो ब्लॉक कर रहे हैं या उनमें देरी कर रहे हैं। बैंकों का तर्क है कि वैश्विक नियमों और कंप्लायंस (Compliance) को लेकर वे और ज़्यादा सतर्क हो गए हैं।
प्रमुख बाजारों पर असर
यह रोक भारतीय उद्योग के लिए दो अहम बाजारों को प्रभावित कर रही है। रूस, भारतीय एक्टिवेटेड कार्बन के लिए सालाना करीब 25,000 टन की खपत वाला बाज़ार है। पहले के प्रतिबंधों के बाद यूरोपीय सप्लायर्स के हटने से इस बाज़ार में भारतीय कंपनियों को फायदा हो रहा था। वहीं, सूडान सालाना लगभग 20,000 टन माल खरीदता है, जिसका बड़ा हिस्सा वहां के गोल्ड माइनिंग सेक्टर में इस्तेमाल होता है। ये दोनों देश मिलकर एक्सपोर्ट्स का एक बड़ा हिस्सा कवर करते हैं।
इंडस्ट्री का दर्द और कॉम्पिटिशन
एक्टिवेटेड कार्बन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Activated Carbon Manufacturers Association of India) ने इस मामले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने इन देशों के साथ व्यापार पर रोक नहीं लगाई है। लेकिन बैंक EU Council Regulation (EU) No. 833/2014 जैसे नियमों का हवाला देकर सख्त ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence) की बात कर रहे हैं।
यह स्थिति ऐसे समय पर आई है जब भारतीय एक्सपोर्टर्स पहले से ही ऊंचे फ्रेट रेट्स (Freight Rates), कंटेनर की कमी और वैश्विक अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर में भारत ने करीब 1.8 लाख टन एक्टिवेटेड कार्बन एक्सपोर्ट किया था, जिससे लगभग ₹4,688 करोड़ का रेवेन्यू मिला था।
इंडस्ट्री को डर है कि अगर पेमेंट की यह रुकावट जारी रही, तो रूस और सूडान के बाज़ारों में भारतीय कंपनियां चीनी मैन्युफैक्चरर्स से पिछड़ जाएंगी। चीनी कंपनियां अक्सर कम कीमत पर प्रोडक्ट ऑफर करती हैं और उनके लॉजिस्टिक्स नेटवर्क भी मज़बूत हैं, जिससे वे भारतीय सप्लायर्स की जगह ले सकती हैं।
