सरकार भारत का पहला नेशनल मिनरल एक्सचेंज (National Mineral Exchange) लॉन्च करने की तैयारी में है। इसका लक्ष्य कच्चे माल की ट्रेडिंग को सेंट्रलाइज करना और देश के भारी-भरकम **₹10.12 लाख करोड़** के मिनरल इंपोर्ट बिल को कम करना है।
बाजार में पारदर्शिता लाने की तैयारी
मिनिस्ट्री ऑफ माइंस FY2027 तक इस एक्सचेंज को पूरी तरह ऑपरेशनल करने पर काम कर रही है। 'मिनरल एक्सचेंज रूल्स, 2026' के नोटिफिकेशन के बाद, सरकार एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक मार्केटप्लेस बना रही है जो प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट्स की मौजूदा जटिल प्रणाली को खत्म करेगा। इसकी जगह एक स्टैंडर्ड और पारदर्शी प्लेटफॉर्म होगा, जहां रियल-टाइम प्राइस डिस्कवरी मुमकिन होगी।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
यह बदलाव कमोडिटी मार्केट के साथ-साथ NMDC, Coal India और बड़ी स्टील कंपनियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। फिलहाल, प्राइवेट डील में कीमतों का पता लगाना मुश्किल होता है। अब सेंट्रलाइज्ड सिस्टम आने से लोकल माइनर्स को मार्केट-ड्रिवन रेट्स मिलेंगे, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन में सुधार की उम्मीद है।
सबसे बड़ी चुनौती: राज्यों का अधिकार
इस प्रोजेक्ट की राह में सबसे बड़ी बाधा संविधान है। माइनिंग लीज और रॉयल्टी पर राज्यों का कंट्रोल होता है। ऐसे में माइनिंग मंत्रालय को सभी राज्यों को इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने के लिए बड़ी मशक्कत करनी होगी। अगर राज्य अपने स्तर पर ही बिक्री जारी रखते हैं, तो एक्सचेंज की पहुंच सीमित रह सकती है।
इंपोर्ट पर लगाम की कोशिश
भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और 'विकसित भारत 2047' के रोडमैप को देखते हुए यह कदम बेहद जरूरी है। साल 2025-26 में भारत का मिनरल इंपोर्ट बिल ₹10.12 लाख करोड़ पहुंच गया था। हालांकि घरेलू उत्पादन ₹50,000 करोड़ (2013-14) से बढ़कर ₹1.86 ट्रिलियन (2025-26) हुआ है, लेकिन मांग को पूरा करने के लिए अभी और भी बड़े बदलावों की दरकार है।
