भारत ने यूरोपियन यूनियन (EU) के लिए सालाना **1.64 मिलियन टन** स्टील एक्सपोर्ट का कोटा हासिल कर लिया है। हालांकि, जुलाई 2026 से लागू हुए नए नियमों के तहत तय सीमा से ज्यादा माल भेजने पर भारी ड्यूटी लगेगी, जिससे भारतीय स्टील कंपनियों की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
भारत ने यूरोपियन यूनियन को किए जाने वाले स्टील एक्सपोर्ट के लिए 1.64 मिलियन टन का सालाना टैरिफ-रेट कोटा फाइनल कर लिया है। इस समझौते में 9.46 लाख टन का हिस्सा 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) स्टेटस के तहत आता है, जबकि 6.94 लाख टन हिस्सा भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से जुड़ा है।
नई ड्यूटी का खतरा
यह कोटा भले ही बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करता है, लेकिन यह EU के नए 'स्टील ओवरकैपेसिटी रेगुलेशन' के दायरे में है। किसी भी स्थिति में यदि भारतीय कंपनियां आवंटित कोटे से ज्यादा स्टील एक्सपोर्ट करती हैं, तो उन्हें 50% की भारी इंपोर्ट ड्यूटी चुकानी होगी। यह नियम भारतीय स्टील के प्रॉफिट मार्जिन को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।
कंपनियों पर असर
यदि ग्लोबल डिमांड कमजोर रहती है और EU का मार्केट जल्दी भर जाता है, तो कंपनियों को अतिरिक्त सप्लाई भारतीय घरेलू बाजार में लानी पड़ेगी। इससे घरेलू कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिसका सीधा असर JSW Steel, Tata Steel, और SAIL जैसे बड़े खिलाड़ियों के मुनाफे पर पड़ने की आशंका है।
FY27 का आउटलुक
मार्केट एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि FY27 में भारत का फिनिश्ड स्टील एक्सपोर्ट 25% से 30% तक गिर सकता है। कोटे की सख्ती के अलावा, 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) की जटिलताएं भी एक्सपोर्टर्स के लिए बड़ी मुसीबत बनी हुई हैं। भारत-EU FTA के 2026 के अंत तक साइन होने की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल कंपनियों को रेगुलेटरी दबाव के बीच संभलकर चलने की जरूरत है।
