Vegetable Oil Imports: जुलाई में 7% गिरी आवक, कच्चे तेल का शेयर बढ़कर 96% हुआ!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Vegetable Oil Imports: जुलाई में 7% गिरी आवक, कच्चे तेल का शेयर बढ़कर 96% हुआ!

भारत का वेजीटेबल ऑयल इंपोर्ट (Vegetable Oil Imports) जुलाई 2026 में पिछले साल के मुकाबले 7% घटकर 15.25 लाख टन रहा। चिंता की बात यह है कि अब कुल इंपोर्ट में कच्चे तेल (Crude Oil) का हिस्सा बढ़कर 96% हो गया है, जो पहले 86% था। इसका मतलब है कि देश में रिफाइनिंग का काम बढ़ रहा है, लेकिन मांग पूरी करने के लिए हम अभी भी ग्लोबल मार्केट पर ही निर्भर हैं।

इंपोर्ट में आई गिरावट

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में भारत का वेजीटेबल ऑयल इंपोर्ट (Vegetable Oil Imports) पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 7% गिरकर 15.25 लाख टन पर आ गया है। पिछले साल जुलाई में यह आंकड़ा 16.48 लाख टन था।

इंपोर्ट की बदलती तस्वीर

आंकड़ों में एक बड़ा और अहम बदलाव देखने को मिला है। अब इंपोर्ट किए जा रहे कुल वेजीटेबल ऑयल में कच्चे तेल (Crude Oil) का हिस्सा बढ़कर 96% हो गया है, जो पहले 86% था। वहीं, रिफाइंड (Refined) तेल का इंपोर्ट लगभग खत्म सा हो गया है और अब यह कुल इंपोर्ट का सिर्फ 4% रह गया है। इस बड़े बदलाव की वजह इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) की मौजूदा संरचना है, जो कच्चे माल के इंपोर्ट को ज़्यादा बढ़ावा देती है बजाय तैयार माल के।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

यह ट्रेंड घरेलू कंपनियों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है, खासकर उनके लिए जिनके पास बड़ी रिफाइनिंग क्षमता है। जब कंपनियां कच्चा तेल इंपोर्ट करती हैं, तो वे उसे देश में ही रिफाइन करती हैं। इससे उनकी अपनी प्रोसेसिंग यूनिट्स का बेहतर इस्तेमाल होता है और वे फाइनल प्रोडक्ट की क्वालिटी पर भी ज़्यादा कंट्रोल रख पाती हैं।

मांग पर असर?

जुलाई में इंपोर्ट में आई यह कमी एक महीने का उतार-चढ़ाव लग रही है, न कि मांग में लंबी मंदी का संकेत। अगर पिछले 9 महीनों (नवंबर 2025 - जुलाई 2026) की बात करें, तो कुल वेजीटेबल ऑयल इंपोर्ट 121.50 लाख टन रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के 116.03 लाख टन से ज़्यादा है। यानी, कुल मिलाकर मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है।

जोखिम और आगे की राह

हालांकि, भारतीय बाजार ग्लोबल सप्लाई पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। पाम ऑयल के लिए हम इंडोनेशिया और मलेशिया पर, जबकि सोयाबीन ऑयल के लिए अर्जेंटीना और ब्राजील पर निर्भर हैं। यह निर्भरता ग्लोबल कीमतों में उठा-पटक और सप्लाई चेन में रुकावटों के प्रति हमें संवेदनशील बनाती है। अगर देश में तिलहन उत्पादन पर मॉनसून का असर पड़ा, तो इंपोर्ट पर हमारी निर्भरता और बढ़ सकती है, जिससे इंपोर्ट बिल पर दबाव आ सकता है।

आगे चलकर, ग्लोबल कमोडिटी कीमतों (Commodity Prices) का रुख और सरकार की इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) में संभावित बदलाव, घरेलू वेजीटेबल ऑयल इंडस्ट्री की दिशा तय करेंगे। साथ ही, देश में तिलहन बुवाई और उत्पादन के आंकड़े भी अहम होंगे कि क्या स्थानीय सप्लाई इंपोर्ट पर निर्भरता कम कर पाती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.