टैरिफ एडजस्टमेंट का असर: एक्सपोर्ट्स में आई बड़ी गिरावट
हाल ही में वाशिंगटन की ओर से की गई रेसिप्रोकल टैरिफ (reciprocal tariff) एडजस्टमेंट से भारत के जेम्स और ज्वेलरी एक्सपोर्ट सेक्टर को कुछ राहत मिलने की उम्मीद जगी है। लेकिन, यह राहत कितनी बड़ी होगी, यह आने वाले वक्त में ही पता चलेगा। दरअसल, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका को भारत के जेम्स और ज्वेलरी एक्सपोर्ट्स में 44.42% की भारी गिरावट आई, जो पिछले साल इसी अवधि में $6.95 बिलियन से घटकर $3.86 बिलियन रह गया। ऐसे में, यह टैरिफ एडजस्टमेंट एक बड़ा कदम है, लेकिन असली खेल पॉलिश किए हुए (polished) डायमंड के सेगमेंट में क्लैरिटी (clarity) पर टिका है।
डायमंड ड्यूटी का पेंच: क्या मिलेगी जीरो-ड्यूटी की राह?
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द पॉलिश किए हुए (polished) डायमंड और कलर्ड जेम्स (coloured gemstones) को लेकर है। इनकी जीरो-ड्यूटी (zero-duty) एक्सेस की मांग लंबे समय से चली आ रही है, जो कि Annexure III के तहत आनी है। 2025 के दौरान इन आइटम्स पर ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी देखी गई। पहले अप्रैल में यह 0% से बढ़कर 10% हुई और फिर अगस्त आते-आते 50% पर पहुंच गई। इसी तरह, ज्वेलरी पर इंपोर्ट ड्यूटी भी 5-7% से बढ़कर 55-57% हो गई। इसके चलते कट और पॉलिश डायमंड के एक्सपोर्ट्स में अकेले 60% की भारी गिरावट आई और यह $1.4 बिलियन तक सिमट गया।
हालांकि, 3 फरवरी, 2026 को घोषित नए द्विपक्षीय व्यापार समझौते (bilateral trade deal) के तहत रेसिप्रोकल टैरिफ को 18% तक सीमित कर दिया गया है। लेकिन, असल बूस्ट तो Annexure III के तहत पॉलिश डायमंड के लिए जीरो-ड्यूटी स्टेटस मिलने से ही मिलेगा। इसके बिना, मार्केट में बड़ी रिकवरी की उम्मीद कम है।
सोने और लैब-ग्रोन डायमंड का क्या है हाल?
सिर्फ डायमंड ही नहीं, सोने के ज्वेलरी एक्सपोर्ट्स में भी गिरावट देखी गई है। स्टडेड गोल्ड ज्वेलरी के एक्सपोर्ट्स 24.54% घटकर $1.5 बिलियन पर आ गए, जबकि प्लेन गोल्ड ज्वेलरी 29% घटकर $183.84 मिलियन पर रही।
दूसरी ओर, लैब-ग्रोन डायमंड (LGD) सेक्टर के लिए अच्छी खबर है। Akoirah by Augmont की फाउंडर, नमिता कोठारी, इसे 'LGD इकोसिस्टम के लिए एक समय पर आया सकारात्मक कदम' मानती हैं। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा LGD मार्केट है। 2024 में जहां इसका बाजार $6.44 बिलियन का था, वहीं 2033 तक यह $19.3 बिलियन तक पहुंच सकता है, जिसमें 12.99% की सीएजीआर (CAGR) से ग्रोथ की उम्मीद है। इसकी वजह है कि ये डायमंड सस्ते हैं और एथिकल सोर्सिंग (ethically sourced) को लेकर लोगों की पसंद बढ़ रही है।
कॉम्पिटिशन और मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स का असर
ऐतिहासिक रूप से, भारत कट और पॉलिश डायमंड और ज्वेलरी कंपोनेंट्स में एक मजबूत कॉम्पिटिटिव एज (competitive advantage) रखता आया है। लेकिन, अमेरिका के मार्केट की हालिया वोलेटिलिटी (volatility) यह दिखाती है कि ट्रेड फ्रिक्शन (trade friction) ने ग्लोबल फ्लो को प्रभावित किया है। इटली और स्विट्जरलैंड जैसे देश भी ज्वेलरी एक्सपोर्ट्स में भारत के बड़े कॉम्पिटिटर हैं और अमेरिका में अच्छी खासी मार्केट शेयर रखते हैं।
अमेरिका दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ज्वेलरी इम्पोर्टर है, जिसमें भारत एक प्रमुख सप्लायर है। भले ही नया टैरिफ एग्रीमेंट भारत की पोजीशन को मजबूत करेगा, लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि हाई टैरिफ के दौर में एक्सपोर्ट्स में काफी वोलेटिलिटी आई है। इसके अलावा, अमेरिकी कंज्यूमर की डिस्पोजेबल इनकम (discretionary spending) और लक्जरी ज्वेलरी पर खर्च करने की इच्छा भी अहम फैक्टर होगी। बढ़ती महंगाई और आर्थिक अनिश्चितताएं डिमांड को कम कर सकती हैं, भले ही इंपोर्ट कॉस्ट कम हो जाए।
इंडस्ट्री बॉडीज जैसे जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) को उम्मीद है कि बायलेटरल डिस्कशन (bilateral discussions) से कुछ हल निकलेगा। हालांकि, अमेरिका पर सेक्टर की निर्भरता को कम करने के लिए भारत UAE और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ भी FTAs कर रहा है, जो कम ड्यूटी और आसान ट्रेड बैरियर्स ऑफर करते हैं।