स्टील टैरिफ से फंसा ट्रेड एग्रीमेंट
भारत और यूके के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (CETA) पर खतरा मंडरा रहा है। नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि ब्रिटेन से आने वाले स्टील पर नए सुरक्षा उपायों (Safeguard Measures) का समाधान होने तक वह ब्रिटिश व्हिस्की पर टैरिफ कम करने के अपने वादे पर आगे नहीं बढ़ेगा। ब्रिटेन के नए नियम 1 जुलाई, 2026 से लागू होने वाले हैं, जो टैरिफ-फ्री स्टील आयात को 60% तक कम कर देंगे। इससे अधिक मात्रा पर 50% का पेनल्टी टैरिफ लगेगा। भारत, जिसने पिछले फाइनेंशियल ईयर में यूके को लगभग $893.4 मिलियन का स्टील एक्सपोर्ट किया था, इसे एक बड़ी बाधा मान रहा है।
व्हिस्की बाजार पर बड़ा असर
भारत में स्कॉच व्हिस्की पर पहले से ही 150% का भारी इंपोर्ट टैरिफ है। CETA के तहत, भारत ने अगले एक दशक में इस ड्यूटी को घटाकर 40% करने का वादा किया था। इससे Diageo और Pernod Ricard जैसी बड़ी कंपनियों को फायदा होने वाला था, क्योंकि भारत स्कॉच के लिए दुनिया का सबसे बड़ा वॉल्यूम मार्केट है। लेकिन अब टैरिफ कटौती पर अनिश्चितता गहरा गई है। स्कॉच व्हिस्की एसोसिएशन का अनुमान है कि इस डील से निर्यात में £1 बिलियन की वृद्धि हो सकती थी, लेकिन मौजूदा गतिरोध से यह सपना टूट सकता है।
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का चक्कर
मामले को और उलझा रहा है यूके का 2027 में लागू होने वाला कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM)। यह नियम कार्बन-इंटेंसिव इंपोर्ट जैसे स्टील और एल्युमिनियम पर टैक्स लगाएगा। अनुमान है कि भारत के $775 मिलियन के एक्सपोर्ट इससे सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। पर्यावरण नीतियों और स्टील कोटा का यह मेल भारतीय निर्माताओं के लिए दोहरी चुनौती खड़ी कर रहा है।
बदले की कार्रवाई का खतरा
नई दिल्ली का यह रुख दिखाता है कि वह अपनी बात पर अड़ी है। भारत उन देशों के समूह में शामिल हो गया है जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) में ब्रिटेन के व्यापार उपायों को चुनौती दे रहे हैं। Pernod Ricard जैसी कंपनियों के लिए स्थिति खास तौर पर गंभीर है, क्योंकि वे पहले से ही भारत में टैक्स और एकाधिकार संबंधी जांचों का सामना कर रही हैं। अगर यह ट्रेड डील सफल नहीं होती, तो रेगुलेटरी जांच और बढ़ते टैरिफ का दोहरा झटका इन कंपनियों के वैल्यूएशन मॉडल को हिला सकता है।
