साल 2026 के शुरुआती 8 महीनों में भारत ने **6.25 लाख टन** तूअर का आयात किया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे के खतरे के कारण सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, हालांकि त्योहारी सीजन के बाद मांग में कमी और मजबूत रुपये के चलते फिलहाल घरेलू कीमतों में नरमी देखी जा रही है।
भारत अब अपनी तूअर दाल की जरूरतों के लिए विदेशों पर पहले से कहीं ज्यादा निर्भर हो गया है। 'इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन' के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के पहले आठ महीनों में आयात 6.25 लाख टन तक पहुंच गया है, जो 2025 की समान अवधि में 4.34 लाख टन था। यह 44% का बड़ा उछाल देश के उन राज्यों में मानसून की बेरुखी को दर्शाता है, जहां फसल पैदावार पर बुरा असर पड़ा है।
ग्लोबल सप्लाई पर बढ़ती निर्भरता
भारत अपनी घरेलू कमी को पूरा करने के लिए मोजाम्बिक, म्यांमार और तंजानिया जैसे देशों से बड़ा स्टॉक मंगवा रहा है। अकेले मोजाम्बिक से ही 2.29 लाख टन का आयात हुआ है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि अब घरेलू दालों के दाम सिर्फ लोकल पैदावार पर नहीं, बल्कि ग्लोबल मार्केट की हलचल और लॉजिस्टिक्स पर भी निर्भर करेंगे।
बाजार में कीमतों का ट्रेंड
फिलहाल, त्योहारी सीजन खत्म होने के बाद डिमांड में सुस्ती है, जिससे पिछले दो हफ्तों में कीमतों में गिरावट आई है। साथ ही, रुपये के मजबूत होने से आयात सस्ता हुआ है, जिसका सीधा असर गुलबर्गा और अकोला जैसी बड़ी मंडियों पर पड़ा है। यहां कीमतों में ₹200 से ₹300 प्रति क्विंटल तक की कमी दर्ज की गई है।
आगे क्या है जोखिम?
भले ही खरीफ सीजन में दालों का रकबा 1.3% बढ़कर 47.25 लाख हेक्टेयर हुआ हो, लेकिन कलबुर्गी जैसे इलाकों में किसानों को अभी भी बारिश का इंतजार है। व्यापारी इस उम्मीद में स्टॉक होल्ड कर रहे हैं कि आगे सप्लाई कम होने पर कीमतें फिर से उछल सकती हैं। अब बाजार की नजरें अंतिम फसल की पैदावार और सरकार की भविष्य की आयात नीति पर टिकी हैं।
