Union Budget 2026-27 के जरिए सरकार ने चंदन की खेती के नियमों में ढील दी है। इसका मकसद भारत को चंदन के आयात पर निर्भरता से निकालकर एक प्रमुख एक्सपोर्टर बनाना है, लेकिन इस लॉन्ग-टर्म निवेश में कुछ जोखिम भी जुड़े हैं।
यूनियन बजट 2026-27 के साथ ही चंदन उद्योग में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने प्राइवेट कल्टिवेशन (निजी खेती) से जुड़े पुराने नियमों को आसान बना दिया है, ताकि पिछले कुछ दशकों से गिरते उत्पादन को फिर से पटरी पर लाया जा सके। भारत का लक्ष्य अब चंदन के तेल (sandalwood oil) के मामले में दुनिया का बड़ा एक्सपोर्टर बनने का है।
आयात पर निर्भरता और नई रणनीति
आंकड़ों पर गौर करें तो 1996 से 2024 के बीच भारत ने 500 टन से अधिक चंदन के तेल का आयात किया है। अब तक सरकार का सख्त नियंत्रण होने के कारण प्राइवेट सेक्टर इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले पा रहा था, जिसका फायदा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने उठाया। नई नीति के तहत कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में एग्रो-फॉरेस्ट्री मॉडल को बढ़ावा दिया जाएगा, जहां किसान आम या अन्य फसलों के साथ चंदन उगा सकेंगे।
खेती के दौरान इन बातों का रखें ध्यान
निवेशकों और किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि Santalum album एक 'हेमी-रूट पैरासिटिक' प्लांट है। यानी यह अपने पोषण के लिए दूसरे पेड़ों (होस्ट) पर निर्भर रहता है। एग्रोनॉमिस्ट्स के मुताबिक, अगर सही तरीके से होस्ट पेड़ों का चुनाव नहीं किया गया या पौधों की प्रूनिंग (छंटाई) सही से नहीं हुई, तो पौधों के मरने का रिस्क बढ़ जाता है, जिससे भारी नुकसान हो सकता है।
लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए क्या है संकेत?
चंदन एक लॉन्ग-टर्म टिंबर इन्वेस्टमेंट है, जिसमें लिक्विडिटी की कमी होती है क्योंकि इसमें फसल तैयार होने में लंबा समय लगता है। यह उन लोगों के लिए है जिनके पास धैर्य है और जो स्पेशलाइज्ड मैनेजमेंट समझते हैं। भविष्य में इस पॉलिसी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे ग्राउंड लेवल पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है और किसानों को तकनीकी सपोर्ट कैसे मिलता है।
