ऑस्ट्रेलियाई स्पोड्यूमिन से बनेंगे भारत में इंडक्शन कुकटॉप ग्लास, चीन पर निर्भरता घटेगी

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AuthorNeha Patil|Published at:
ऑस्ट्रेलियाई स्पोड्यूमिन से बनेंगे भारत में इंडक्शन कुकटॉप ग्लास, चीन पर निर्भरता घटेगी

भारत अब ऑस्ट्रेलिया से स्पोड्यूमिन (Spodumene) मंगाकर देश में ही इंडक्शन कुकटॉप के लिए खास सिरेमिक ग्लास (Ceramic Glass) बनाने की तैयारी में है। इस कदम से चीन से होने वाले आयात पर निर्भरता कम होगी। राजस्थान में एक नई फैक्ट्री अगस्त 2026 तक ट्रायल प्रोडक्शन के लिए तैयार हो जाएगी।

इंडक्शन कुकटॉप की सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव

सरकार इंडक्शन और इंफ्रारेड कुकटॉप के लिए जरूरी खास सिरेमिक ग्लास बनाने के लिए स्पोड्यूमिन जैसे अहम मिनरल की सप्लाई ऑस्ट्रेलिया से सुनिश्चित कर रही है। अभी तक इस सेगमेंट में इंडस्ट्री काफी हद तक चीन से इंपोर्ट पर निर्भर है।

इस इंपोर्ट को कम करने के लिए राजस्थान में एक नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई जा रही है। उम्मीद है कि यह अगस्त 2026 तक ट्रायल प्रोडक्शन शुरू कर देगी। इस प्लांट की क्षमता हर महीने 15 लाख यूनिट, यानी सालाना करीब 1.5 करोड़ यूनिट बनाने की होगी। यह भारत को इस जरूरी कंपोनेंट के लिए आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

मैन्युफैक्चरर्स को मिली राहत

घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को कंपोनेंट की कमी और बढ़ती कीमतों से तत्काल राहत देने के लिए सरकार ने कुछ नियमों को टाल दिया है। इंडक्शन कुकटॉप के लिए जरूरी स्टार-लेबलिंग (Star-Labelling) को 1 जुलाई 2026 से बढ़ाकर 1 जनवरी 2027 कर दिया गया है। साथ ही, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (Quality Control Order) के तहत आने वाली जरूरी शर्तों को भी छह महीने के लिए टाल दिया गया है। इससे कंपनियों को घरेलू प्रोडक्शन शुरू होने का इंतजार करते हुए अपनी सप्लाई चेन और स्टॉक को मैनेज करने के लिए ज्यादा समय मिलेगा।

इंपोर्ट पर निर्भरता की समस्या

इंडक्शन स्टोव बनाने वाली कंपनियों के लिए सिरेमिक ग्लास टॉप एक बड़ी रुकावट बने हुए हैं। हालिया सप्लाई चेन में आई दिक्कतों के चलते इन इंपोर्टेड कंपोनेंट्स की कीमत 15-25% तक बढ़ गई है। इतना ही नहीं, इन पार्ट्स को मंगाने में लगने वाला समय भी काफी बढ़ गया है, जो पहले 2 हफ्तों से बढ़कर अब 5 हफ्तों तक पहुंच गया है। ऑस्ट्रेलिया से स्पोड्यूमिन जैसे कच्चे माल की सोर्सिंग और देश में डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बढ़ाकर इंडस्ट्री का लक्ष्य इन लागतों को स्थिर करना और सप्लाई चेन को छोटा करना है।

जोखिम और चुनौतियां

हालांकि, डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ावा देना कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर के लिए एक बड़ा पॉजिटिव कदम है, लेकिन इसमें कुछ जोखिम भी हैं। राजस्थान में नई फैक्ट्री के कंस्ट्रक्शन, मशीनरी इंस्टॉलेशन या शुरुआती प्रोडक्शन की क्वालिटी में देरी जैसी चुनौतियां आ सकती हैं। निवेशकों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि ऑस्ट्रेलियाई स्पोड्यूमिन पर स्विच करने के बाद भी कच्चे माल की लागत ग्लोबल कमोडिटी कीमतों के उतार-चढ़ाव के अधीन रहेगी। इस पहल की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि फैक्ट्री कितनी कुशलता से प्रोडक्शन बढ़ाती है और इंपोर्टेड विकल्पों के बराबर क्वालिटी बनाए रखती है।

निवेशकों के लिए क्या है खास

निवेशकों को किचन अप्लायंस सेक्टर की लिस्टेड कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर इन बदलावों के असर पर नजर रखनी चाहिए। नियमों का आगे बढ़ना फिलहाल एक राहत है, लेकिन लंबी अवधि में मार्जिन में सुधार डोमेस्टिक प्लांट के सफल चालू होने और प्रोडक्शन पर निर्भर करेगा। निवेशकों को आने वाली तिमाही नतीजों में मैनेजमेंट की ओर से कच्चे माल की लागत में बचत पर टिप्पणी, राजस्थान प्लांट की प्रगति और कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर के लिए सरकार की इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन (Import Substitution) रणनीति में किसी भी नए डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए।

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