भारत सरकार ने खाने के तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए कमर कस ली है। नेशनल मिशन के तहत **2030** तक **30 लाख टन** पाम ऑयल उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, ताकि विदेशों पर निर्भरता कम की जा सके।
भारत की रणनीति और आयात पर लगाम
भारत अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने और विदेशी कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए अब इंडोनेशिया और मलेशिया से होने वाले भारी आयात को कम करना चाहता है। भारत की कुल खाने योग्य तेल खपत में पाम ऑयल की हिस्सेदारी 38% है, जिसे अब घरेलू स्तर पर पूरा करने की योजना है।
क्यों पाम ऑयल का उत्पादन है गेम चेंजर?
पाम ऑयल की सबसे बड़ी खूबी इसकी पैदावार है। सरसों जैसी पारंपरिक फसलों के मुकाबले, पाम ऑयल का उत्पादन कहीं अधिक होता है। आंकड़ों के मुताबिक, पाम ऑयल का यील्ड 4 टन प्रति हेक्टेयर तक हो सकता है, जबकि सरसों के लिए यह केवल 1.2 टन प्रति हेक्टेयर रहता है। यह अधिक यील्ड आम लोगों के लिए कुकिंग ऑयल की कीमतों को कंट्रोल रखने में मदद करेगा।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
अभी देश में 90 लाख टन से ज्यादा पाम ऑयल आयात होता है। Adani Wilmar और Patanjali Foods जैसी रिफाइनिंग करने वाली कंपनियों के लिए यह बदलाव लॉन्ग टर्म में ग्लोबल कमोडिटी प्राइस के झटकों से बचने का जरिया बन सकता है। वहीं, Godrej Agrovet जैसे खिलाड़ी सीधे प्लांटेशन और खेती के विस्तार में जुटे हैं। घरेलू सप्लाई बढ़ने से इन कंपनियों का सप्लाई चेन मैनेजमेंट और अधिक मजबूत होगा।
ग्लोबल चुनौतियां और सस्टेनेबिलिटी
यूरोपीय संघ (EU) जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अब ट्रेसेबिलिटी और डीफॉरेस्टेशन को लेकर कड़े नियम लागू हैं। भारत को अपने घरेलू उत्पादन को इन अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से ढालना होगा, जिसमें शुरुआती स्तर पर ऑपरेशनल लागत बढ़ सकती है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि पाम ऑयल का प्लांटेशन एक लंबी प्रक्रिया है। प्रोजेक्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी तेजी से जमीन का आवंटन करती है और कंपनियों का प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर कितनी तेजी से तैयार होता है।
