उत्तर प्रदेश में बेमौसम बारिश के कारण गन्ने की कटाई में देरी हो रही है, जिससे नवंबर की **23 लाख टन** की मांग के मुकाबले सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। फिलहाल बाजार में **15 लाख टन** का कैरीओवर स्टॉक मौजूद है, जो मांग और सप्लाई के बीच के फासले को चौड़ा कर रहा है।
भारतीय चीनी सेक्टर के लिए हार्वेस्टिंग सीजन की शुरुआत काफी चुनौतीपूर्ण रही है। उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है, वहां हो रही बारिश ने कटाई की पूरी समय-सारणी बिगाड़ दी है। अक्टूबर के अंत में और अधिक बारिश की चेतावनी ने न केवल ऑपरेशंस को धीमा किया है, बल्कि कच्चे माल की क्वालिटी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सप्लाई का गणित और उत्पादन का दबाव
आंकड़ों के अनुसार, नवंबर महीने में देश में चीनी की कुल मांग 23 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि हमारे पास केवल 15 लाख टन का पुराना स्टॉक उपलब्ध है। इस अंतर को भरने के लिए नई फसल पर निर्भरता बढ़ गई है। देश भर में 100 से ज्यादा मिलों ने कमी को पूरा करने के लिए पहले ही क्रशिंग शुरू कर दी है, लेकिन यूपी में देरी का सीधा बोझ अब महाराष्ट्र की मिलों पर आ गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में खेतों में पानी भरे होने के कारण किसानों को कटाई टालनी पड़ रही है, जिससे मिलों के पास गन्ना पहुंचने का सिलसिला धीमा पड़ गया है।
कीमतों पर असर और सरकारी रुख
सप्लाई की अनिश्चितता के कारण घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में पहले ही तेजी देखी जा रही है। सरकार ने पहले ही बाजार को स्टेबल करने के लिए 2.65 लाख टन चीनी के आयात (Import) को मंजूरी दी थी। हालांकि, ऊंची लागत की वजह से अब तक ये आयात सीमित रहे हैं, लेकिन अगर घरेलू कमी नवंबर में भी बनी रहती है, तो इंपोर्ट में तेजी आना तय है।
निवेशकों के लिए काम की बात
निवेशकों को अब आने वाले कुछ हफ्तों में मिलों की कार्यक्षमता और मौसम के मिजाज पर पैनी नजर रखनी होगी। मिलें कितनी कुशलता से बिना लागत बढ़ाए क्रशिंग जारी रखती हैं, इसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा। इसके अलावा, सरकारी स्तर पर निर्यात या आयात से जुड़े किसी भी नए फैसले पर नजर बनाए रखना बहुत जरूरी होगा।
