Sugar Sector Update: चीनी उत्पादन में भारी उछाल, क्या Ethanol पॉलिसी बिगाड़ेगी मिलों का गणित?

COMMODITIES
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
Sugar Sector Update: चीनी उत्पादन में भारी उछाल, क्या Ethanol पॉलिसी बिगाड़ेगी मिलों का गणित?

भारत में चीनी का उत्पादन अक्टूबर 2026 में उछलकर **8.45 लाख टन** पर पहुंच गया है, जो पिछले साल इसी दौरान महज **1 लाख टन** था। हालांकि उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन सरकार की ओर से शुगर-टू-इथेनॉल डायवर्जन पर लगाई गई रोक निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

अक्टूबर 2026 में भारत का चीनी उत्पादन सीजन उम्मीद से कहीं ज्यादा रफ्तार से शुरू हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में कुल 8.45 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह आंकड़ा सिर्फ 1 लाख टन था। इस उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह महाराष्ट्र की मिलें हैं, जहां 123 मिलों ने जल्दी काम शुरू किया और कुल उत्पादन में 7.20 लाख टन का योगदान दिया। पूरे देश में 152 मिलें सक्रिय हैं, जबकि पिछले साल अक्टूबर तक सिर्फ 31 मिलें ही चालू थीं।

रेवेन्यू मॉडल में बड़ा बदलाव

चीनी मिलों के लिए अब चुनौती एक नई सरकारी नीति से जुड़ी है। सरकार ने 2026-27 के इथेनॉल सप्लाई ईयर के लिए साफ़ कर दिया है कि किसी भी प्रकार के गन्ने के रस, शुगर सिरप या 'बी-हैवी मोलासेस' का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए नहीं किया जा सकेगा। पिछले सालों में मिलें इसी डायवर्जन से मोटा मुनाफा कमाती थीं, लेकिन 'जीरो डायवर्जन' पॉलिसी से यह रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है, जिससे मिलों के मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।

रिकवरी रेट और लागत का दबाव

निवेशक चीनी मिलों की कार्यक्षमता पर भी नजर गड़ाए हुए हैं। इस साल चीनी का रिकवरी रेट लगभग 8.01% है, जो पिछले सीजन के 8.44% से काफी कम है। कम रिकवरी रेट का मतलब है कि गन्ने की समान मात्रा से मिलों को कम चीनी मिल रही है, जिससे प्रति यूनिट प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ जाती है।

सरकारी कंट्रोल और भविष्य की राह

सरकार घरेलू बाजार में कीमतों को स्टेबल रखने के लिए सक्रिय है। नवंबर के पहले पखवाड़े के लिए 13 लाख टन का शुगर कोटा तय किया गया है। इसके अलावा, Advance Licence Scheme के खत्म होने के बाद अब पूरा फोकस घरेलू सप्लाई पर है। चूंकि गन्ने का FRP (Fair and Remunerative Price) ₹365 प्रति क्विंटल तय है, इसलिए मिलों की लागत तो फिक्स है। अब देखना यह होगा कि क्या बाजार में चीनी की कीमतें इतनी बनी रहेंगी कि इथेनॉल से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सके, या फिर कम मार्जिन और ज्यादा सप्लाई का असर मिलों की बैलेंस शीट पर दिखेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.