क्यों हो रहा है मिलों को नुकसान?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीनी का औसत एक्स-मिल प्राइस (Ex-mill Price) करीब ₹3,850 प्रति क्विंटल है, जो अनुमानित प्रोडक्शन कॉस्ट ₹4,100 से ₹4,160 प्रति क्विंटल से काफी कम है। इसका सीधा मतलब है कि हर क्विंटल चीनी पर मिलों को ₹250 से ₹310 का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सरकारी दाम बने बड़ी बाधा
इस समस्या की जड़ें सरकारी दामों में हैं। चीनी का मिनिमम सेलिंग प्राइस (MSP) फरवरी 2019 से ₹31 प्रति किलोग्राम पर ही अटका हुआ है। वहीं, गन्ने का फेयर एंड रेमुनरेटिव प्राइस (FRP), जो मुख्य कच्चा माल है, 2025-26 सीजन के लिए बढ़कर ₹355 प्रति क्विंटल हो गया है, जो पिछले साल ₹340 और 2019-20 में ₹275 था। गन्ने की बढ़ती लागत और स्थिर बिक्री मूल्य का यह अंतर मिलों की कमर तोड़ रहा है।
एथनॉल (Ethanol) की दरें भी अटकीं
स्थिति को और खराब कर रहा है एथनॉल (Ethanol) की खरीद दरों का न बढ़ना। B-heavy molasses और गन्ने के रस/सिरप से बनने वाले एथनॉल की कीमतें 2022-23 सप्लाई ईयर से क्रमश: ₹60.73 और ₹65.61 प्रति लीटर पर स्थिर हैं। इससे मिलों को एथनॉल से होने वाली आमदनी का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है, जो इस घाटे को कुछ हद तक पूरा कर सके।
किसानों का बकाया बढ़ा, भविष्य पर खतरा
इस वित्तीय दबाव का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। फरवरी 2026 के मध्य तक, गन्ना बकाया (Cane Dues) लगभग ₹16,000 से ₹16,087 करोड़ तक पहुंच गया था। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी मार्च 2026 तक ₹4,898 करोड़ का गन्ना बकाया दर्ज किया गया। समय पर भुगतान न होने से किसानों का भरोसा हिल रहा है और भविष्य में गन्ना बुवाई कम होने का खतरा मंडरा रहा है, जो भारतीय चीनी सप्लाई के लिए एक बड़ा जोखिम है।
इंडस्ट्री की मांग: MSP में हो बढ़ोतरी
इंडस्ट्री (Industry) अब सरकार से गुहार लगा रही है कि चीनी का MSP बढ़ाकर ₹41 से ₹41.66 प्रति किलोग्राम (यानी ₹4,000 प्रति क्विंटल) किया जाए, ताकि प्रोडक्शन कॉस्ट और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर खत्म हो सके और मिलें पटरी पर लौट सकें।
ग्लोबल मार्केट और नीतिगत निर्भरता
वैश्विक स्तर पर भी ब्राजील से सरप्लस सप्लाई के कारण चीनी की कीमतें गिर रही हैं, जो भारतीय एक्सपोर्ट (Export) की प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित कर रहा है। कुल मिलाकर, भारतीय चीनी सेक्टर की स्थिरता काफी हद तक सरकारी नीतियों पर निर्भर करती है। MSP और एथनॉल की कीमतों में ज़रूरी बढ़ोतरी ही इस इंडस्ट्री को डूबने से बचा सकती है।