भारत का शुगर सेक्टर 2026-27 के सीजन में बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। खराब मौसम और सरकारी नीति के चलते उत्पादन **29 से 31 मिलियन टन** रहने का अनुमान है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है।
शुगरकेन क्रशिंग सीजन 15 अक्टूबर से महाराष्ट्र में शुरू होने जा रहा है, लेकिन इंडस्ट्री के लिए हालात सामान्य नहीं हैं। अल नीनो के कारण सूखे के हालात बने हुए हैं, जिससे गन्ने की पैदावार और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ने की आशंका है। जानकारों के मुताबिक, इस साल कुल चीनी का उत्पादन 29 से 31 मिलियन टन के बीच सीमित रहने की उम्मीद है।
मार्जिन पर बढ़ता दबाव
चीनी मिलें एक बड़े 'कॉस्ट-प्राइस स्क्वीज' से गुजर रही हैं। सरकार ने गन्ने का फेयर एंड रेम्युनेरेटिव प्राइस (FRP) ₹365 प्रति क्विंटल तय कर रखा है, जबकि चीनी का मिनिमम सेलिंग प्राइस ₹31 प्रति किलो पर 2019 से ही अटका हुआ है। कच्चे माल की बढ़ती लागत और चीनी की स्थिर कीमतों के बीच मिलों के लिए मुनाफा कमाना मुश्किल होता जा रहा है।
इथेनॉल पॉलिसी में बदलाव
सरकार की प्राथमिकता अब इथेनॉल के बजाय फूड सिक्योरिटी पर है। इसके चलते, गन्ने के रस और बी-हेवी मोलासेस से इथेनॉल बनाने पर पाबंदियां लग सकती हैं। सरकार के इस कदम से उन शुगर मिलों का रेवेन्यू मॉडल सीधे तौर पर प्रभावित होगा, जिन्होंने इथेनॉल कैपेसिटी में भारी निवेश किया था। अब इंडस्ट्री को इथेनॉल ब्लेंडिंग टारगेट पूरा करने के लिए अनाज (मक्का और चावल) पर निर्भर रहना होगा।
सरकार का कड़ा रुख
महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार ने ड्यूटी-फ्री रॉ शुगर इंपोर्ट की मंजूरी दी है और डीलर्स पर स्टॉक लिमिट भी लगा दी है। ये कदम आम उपभोक्ताओं के लिए तो राहत भरे हैं, लेकिन चीनी मिलों की मार्केट-ड्रिवेन प्रॉफिट कमाने की क्षमता पर ब्रेक लगा रहे हैं।
