भारत में स्टील की मांग उत्पादन से ज्यादा हो गई है, जिससे देश को इंपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ रहा है। हॉट-रोल्ड कॉइल की कीमतें **4 साल** के पीक पर पहुंच गई हैं, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
भारत का स्टील सेक्टर इस वक्त बड़े संकट से गुजर रहा है। देश में स्टील की मांग इतनी तेजी से बढ़ रही है कि घरेलू उत्पादन उसे पूरा करने में पीछे छूट रहा है। नवंबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, सप्लाई की कमी के कारण कीमतें 4 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं। हॉट-रोल्ड कॉइल की कीमत फिलहाल ₹62,000 प्रति टन के आसपास बनी हुई है।
डिमांड और सप्लाई का गणित
भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला स्टील मार्केट है, जहां 2026 में 7.9% और 2027 में 8% की मांग वृद्धि का अनुमान है। इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑटोमोटिव सेक्टर की डिमांड ने स्टील की खपत को रिकॉर्ड लेवल पर पहुंचा दिया है। हालांकि, उत्पादन क्षमता धीमी होने के कारण भारत अब फिनिश्ड स्टील का 'नेट इंपोर्टर' बन चुका है।
मार्जिन पर कच्चे माल का दबाव
स्टील कंपनियों के लिए चिंता का बड़ा विषय कोकिंग कोल है, जो कुल लागत का करीब 40% हिस्सा रखता है। कीमतों में अस्थिरता के कारण कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर खतरा मंडरा रहा है। अगर स्टील कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनकी बैलेंस शीट प्रभावित हो सकती है। वहीं, महंगी स्टील का असर रियल एस्टेट और ऑटो सेक्टर पर भी पड़ रहा है, जिससे प्रोजेक्ट्स में देरी की आशंका है।
सरकार की नजर और आगे की राह
सरकार इस सप्लाई-डिमांड गैप को देखते हुए इंपोर्टेड स्टील पर 'एंटी-डंपिंग ड्यूटी' लगाने पर विचार कर रही है, ताकि घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को सस्ते विदेशी स्टील से बचाया जा सके। निवेशकों के लिए फिलहाल सरकारी पॉलिसी के बदलाव और कच्चे माल की कीमतों पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
