कीमतों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
भारतीय स्टील उत्पादक एक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। अप्रैल में चीन से तैयार स्टील का इम्पोर्ट 232,000 मीट्रिक टन तक पहुँच गया, जो पिछले 2 सालों का सबसे बड़ा आंकड़ा है। दिसंबर में लगाए गए सुरक्षात्मक टैरिफ (Protective Tariffs) भी इन इम्पोर्ट्स को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इन टैरिफ का मकसद भारतीय निर्माताओं को राहत देना था, लेकिन चीन के मुकाबले $11 से $37 प्रति टन का बड़ा प्राइस गैप दिखाता है कि बाजार की ताकत नियमों पर भारी पड़ रही है।
मार्केट में गड़बड़ी की वजहें
इस सप्लाई असंतुलन के पीछे सीधी प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ अप्रत्यक्ष तरीके भी हैं। खासकर हॉट-रोल्ड कॉइल (Hot-Rolled Coil) सेगमेंट में, मध्य पूर्व के व्यापार मार्गों में आई रुकावटों के कारण फंसे हुए माल (Distressed Cargo) ने स्थानीय बाजार को भर दिया है। इतना ही नहीं, कुछ खास स्टेनलेस स्टील ग्रेड्स पर टैरिफ की कमी एक बड़ी कमजोरी बनकर उभरी है। जिंदल स्टेनलेस (Jindal Stainless) जैसी कंपनियों के नेताओं ने चिंता जताई है कि वियतनाम जैसे देशों से होकर आने वाले इम्पोर्ट्स, जो तरजीही नियमों के तहत देश में आ रहे हैं, उनके लॉन्ग-टर्म कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) के प्रोत्साहन को खत्म कर रहे हैं। यह तब हो रहा है जब पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में भारत बड़े पैमाने पर नेट एक्सपोर्टर (Net Exporter) बना हुआ था।
मंदी के संकेत (Bear Case)
इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) और ऑटोमोटिव (Automotive) डिमांड पर निर्भरता, जो अतिरिक्त घरेलू क्षमता को खपाने के लिए जरूरी थी, अब कमजोर पड़ती दिख रही है। निवेशकों को यह ध्यान देना चाहिए कि जब इम्पोर्ट वॉल्यूम बढ़ता है और घरेलू खपत भी बढ़ती है - जैसा कि अप्रैल में 8.2% की साल-दर-साल वृद्धि में देखा गया - तब स्थानीय मिलों की उस ग्रोथ का फायदा उठाने में असमर्थता, मार्जिन में बड़ी कमी का संकेत देती है। दुनिया भर के अन्य निर्माताओं के विपरीत, भारतीय मिलें अभी भी रॉ मटेरियल (Raw Material) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सरकारी नीतियों में बदलाव के प्रति बहुत संवेदनशील हैं। आसियान (ASEAN) फ्रेमवर्क पर निर्भरता एक बड़ी कमजोरी बनी हुई है, क्योंकि यह ऐसे स्टील के लिए एक रास्ता खोलता है जो डायरेक्ट बायलेटरल सेफगार्ड्स (Bilateral Safeguards) को बायपास कर सकता है। अगर दूसरी तिमाही में भी इम्पोर्ट इसी रफ्तार से जारी रहता है, तो घरेलू निर्माताओं को या तो मार्केट शेयर गंवाना होगा या कीमतों को लेकर एक बड़ी दौड़ में शामिल होना होगा, जिससे मुनाफे को खतरा होगा।
आगे क्या?
बाजार के जानकारों की राय अभी भी सतर्क है। वे इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि क्या स्टील मिनिस्ट्री (Ministry of Steel) टैरिफ कवरेज को बढ़ाएगी या इम्पोर्ट को रोकने के लिए कोटा (Quota) लागू करेगी। मांग अच्छी होने के बावजूद, समस्या स्टील में रुचि की कमी की नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादकों की प्राइसिंग पावर (Pricing Power) की कमी की है। जब तक नीति निर्माता स्टेनलेस स्टील पर टैरिफ छूट और ट्रांसशिप्ड (Transshipped) सामान के लिए रूल्स ऑफ ओरिजिन (Rules of Origin) को टाइट नहीं करते, तब तक घरेलू मिलों को ग्लोबल सप्लाई और क्षेत्रीय व्यापार की कमजोरियों से जूझना पड़ सकता है।
