अनियमित मानसून के चलते USDA ने भारत का साल 2026-27 के लिए सोयाबीन उत्पादन अनुमान घटाकर **9.6 मिलियन टन** कर दिया है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को करीब **5 लाख टन** सोयाबीन का इंपोर्ट करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर सोयाबीन प्रोसेसर और पोल्ट्री इंडस्ट्री के मार्जिन पर पड़ेगा।
अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने भारत के साल 2026-27 के सोयाबीन फसल के अनुमान को घटाकर 9.6 मिलियन टन कर दिया है। इस गिरावट की मुख्य वजह बेमौसम बारिश रही है, जिसने बुवाई के शेड्यूल को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके अलावा, किसान भी अब सोयाबीन छोड़कर कॉटन और मक्का जैसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनमें इनकम की स्टेबिलिटी ज्यादा दिख रही है।
प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट पर असर
घरेलू बाजार में सोयाबीन की कम सप्लाई के कारण इसके दाम ऊंचे बने हुए हैं। लागत बढ़ने की वजह से भारतीय सोयाबीन मील की ग्लोबल मार्केट में कॉम्पिटिटिवनेस कम हो गई है, क्योंकि विदेशी खरीदार साउथ अमेरिका जैसे सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। नतीजतन, एक्सपोर्ट के 4 साल के निचले स्तर पर आने की आशंका है। ऑयल एक्सट्रैक्शन और प्रोसेसिंग कंपनियों के लिए यह मुश्किल दौर है, क्योंकि बढ़ती इनपुट कॉस्ट को ग्राहकों पर डालना उनके लिए आसान नहीं होगा, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
फीड सेक्टर की बढ़ती मुश्किलें
पोल्ट्री और एनिमल फीड इंडस्ट्री के लिए स्थिति और जटिल हो गई है। मक्का का इस्तेमाल अब इथेनॉल बनाने में ज्यादा हो रहा है, जिसकी वजह से पोल्ट्री इंडस्ट्री सोयाबीन मील पर निर्भर हो गई है। देश की कुल सोयाबीन मांग और उत्पादन के बीच के गैप को भरने के लिए भारत अब लगभग 5 लाख टन सोयाबीन इंपोर्ट करने की तैयारी में है।
इन्वेस्टर्स के लिए आने वाले कुछ महीने काफी महत्वपूर्ण हैं। सोया प्रोसेसिंग, एनिमल फीड और पोल्ट्री सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर रखना जरूरी होगा। यह देखना अहम होगा कि मैनेजमेंट बढ़ती रॉ-मटेरियल कॉस्ट और इंपोर्ट के दबाव को अपने प्रॉफिटेबिलिटी पर कैसे मैनेज करता है।
