देश में सोयाबीन के उत्पादन में **14%** की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस कमी को पूरा करने के लिए **2025-26** सीजन में सोयाबीन का आयात **9 से 10 लाख टन** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जिससे पोल्ट्री और लाइवस्टॉक सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है।
भारत के सोयाबीन मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी सोयामील का निर्यातक (Exporter) रहने वाला भारत अब कच्चे सोयाबीन का बड़े पैमाने पर आयात करने वाला देश बन गया है। 2025-26 फाइनेंशियल ईयर के दौरान आयात के 10 लाख टन के करीब पहुंचने की उम्मीद है, जो घरेलू बाजार में भारी उठापटक का संकेत है।
उत्पादन घटने की मुख्य वजह
इस संकट की जड़ घरेलू उत्पादन में आई गिरावट है। इस साल सोयाबीन का उत्पादन घटकर करीब 110 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के 128 लाख टन से 14% कम है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मानसून की अनिश्चितता ने फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है। साथ ही, किसान अब सोयाबीन के बजाय कपास और मक्का जैसी अधिक मुनाफे वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे सोयाबीन की उपलब्धता कम हो गई है।
कारोबार और मुनाफे पर असर
घरेलू कीमतों का सरकारी Minimum Support Price (MSP) से काफी ऊपर बने रहने के कारण प्रोसेसिंग कंपनियों का काम प्रभावित हुआ है। मंहगे कच्चे माल के चलते कई कंपनियों को अपने सोयम मील एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द करने पड़े हैं। इसका सीधा असर पोल्ट्री और लाइवस्टॉक इंडस्ट्री पर पड़ा है, क्योंकि उनके लिए फीड की लागत बढ़ गई है, जिससे मुनाफे पर बुरा असर पड़ रहा है।
आयात की नई रणनीति
सप्लाई गैप को भरने के लिए भारत मुख्य रूप से बेनिन, टोगो, नाइजीरिया और नाइजर जैसे अफ्रीकी देशों से नॉन-जीएम सोयाबीन आयात कर रहा है। जीरो-टैरिफ व्यवस्था का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन पोर्ट कंजेशन और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। अब बाजार की नजरें मानसून के अगले पैटर्न और अफ्रीकी देशों की प्रोसेसिंग क्षमता पर टिकी हैं, जो भविष्य में आयात की लागत तय करेंगी।
