भारत की बड़ी चाल: ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई पक्की करने की तैयारी!

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत की बड़ी चाल: ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई पक्की करने की तैयारी!

भारत इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और रिन्यूएबल एनर्जी इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई सुरक्षित करने की दिशा में तेज़ी से काम कर रहा है। इस अहम कदम का मकसद चीन पर अपनी भारी निर्भरता को कम करना है, जो फिलहाल इन ज़रूरी संसाधनों की ग्लोबल सप्लाई चेन पर हावी है।

ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से सप्लाई का नया प्लान

भारत अब अपने इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) सेक्टर को मज़बूती देने के लिए ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ सप्लाई चेन (Supply Chain) को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है। इसका मुख्य मकसद क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) की सप्लाई को सुरक्षित करना है, ताकि चीन पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सके। आपको बता दें कि ये मिनरल्स EV की बैट्री और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए बेहद ज़रूरी हैं।

अभी कितनी है सप्लाई और कितना है स्कोप?

हालांकि, ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इन देशों से भारत की सप्लाई अभी काफी कम है। भारत, ऑस्ट्रेलिया के कुल क्रिटिकल मिनरल्स एक्सपोर्ट का महज़ 0.11% ही खरीदता है, जिसकी कीमत करीब $3.7 मिलियन डॉलर है। इसी तरह, इंडोनेशिया के ग्लोबल सप्लाई का सिर्फ 2.06% भारत के हिस्से आता है। वहीं, भारत की कुल मिनरल ज़रूरतों में ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया का योगदान 0.14% और 0.28% है। यह दिखाता है कि भले ही अभी व्यापार कम है, लेकिन भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) की बढ़ती मांगों को देखते हुए इसमें काफी ज़्यादा ग्रोथ की संभावना है।

सप्लाई चेन बदलने की चुनौतियाँ

इन बाजारों में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि चीन पहले से ही इन दोनों देशों का प्रमुख व्यापारिक पार्टनर है। चीन ऑस्ट्रेलिया के लगभग 91% क्रिटिकल मिनरल्स एक्सपोर्ट खरीदता है, और इंडोनेशिया के शिपमेंट्स के लिए भी यह एक बड़ा बाज़ार है। ग्लोबल एक्सपोर्ट में चीन की 17.6% हिस्सेदारी भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है। भारतीय कंपनियों और सरकार को कॉम्पिटिटिव लॉजिस्टिक्स (Logistics) और लॉन्ग-टर्म ऑफ-टेक एग्रीमेंट (Off-take Agreement) बनाने होंगे ताकि इन रिसोर्सेज (Resources) को चीन के स्थापित व्यापारिक रूट से हटाया जा सके।

यूरेनियम और एनर्जी सिक्योरिटी पर भी फोकस

इंडस्ट्रियल मिनरल्स (Industrial Minerals) के अलावा, भारत ऑस्ट्रेलिया के साथ यूरेनियम (Uranium) सप्लाई को लेकर भी बातचीत कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार हैं। इस तरह का कोई भी समझौता भारत के एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) के बड़े लक्ष्य का हिस्सा बन सकता है। इन रिसोर्सेज तक पहुँचने से भारतीय एनर्जी सेक्टर के इनपुट कॉस्ट (Input Cost) को स्थिर करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, निवेशकों को इन ट्रेड एग्रीमेंट्स (Trade Agreements) की समय-सीमा और नई सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) स्थापित करने की लागत पर नज़र रखनी होगी। अंततः, भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को इसका कितना फायदा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ये ट्रेड चैनल कितनी तेज़ी से बढ़ाए जा सकते हैं और क्या इन नए पार्टनर्स से इंपोर्ट की लागत मौजूदा ग्लोबल सोर्स (Global Source) की तुलना में प्रतिस्पर्धी रहती है।

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