रूस के साथ रुपये में पेमेंट सेटलमेंट की सुविधा से भारतीय ऑर्थोडॉक्स चाय के एक्सपोर्ट में तेजी आई है। हालांकि, अमेरिका के टैरिफ, बढ़ती शिपिंग लागत और यूरोप के कड़े नियमों के चलते चाय सेक्टर के सामने बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हैं।
भारत और रूस के बीच गहरे होते एनर्जी रिश्तों का सीधा फायदा अब भारतीय चाय कंपनियों को मिल रहा है। चूंकि भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल (Crude Oil) आयात कर रहा है, ऐसे में रूसी व्यापारियों के पास रुपये का भारी भंडार जमा हो गया है। इस लिक्विडिटी ने पेमेंट सिस्टम को इतना आसान बना दिया है कि रूसी आयातक अब बिना किसी करेंसी कन्वर्जन की झंझट के प्रीमियम ऑर्थोडॉक्स चाय खरीद पा रहे हैं।
पेमेंट ब्रिज और एक्सपोर्ट में बदलाव
डेटा के अनुसार, दोनों देशों के बीच लगभग 96% द्विपक्षीय लेनदेन अब रुपये-रूबल पेमेंट ब्रिज के जरिए हो रहे हैं। इस सिस्टम ने लेनदेन की मुश्किलों को काफी कम कर दिया है। चाय उद्योग की बात करें, तो कंपनियां अब वॉल्यूम के पीछे भागने के बजाय हाई-वैल्यू और क्वालिटी-फोक्स्ड एक्सपोर्ट्स पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, जो इस सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत है।
राह में कौन सी चुनौतियां?
इस चमक के बावजूद ग्लोबल स्तर पर कई जोखिम बने हुए हैं। अमेरिकी टैरिफ नीतियां, जो रूस के साथ भारत के एनर्जी ट्रेड से जुड़ी हैं, भारतीय एक्सपोर्टर्स को प्रतिस्पर्धी नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण इंश्योरेंस प्रीमियम और शिपिंग लागत बढ़ गई है, जिससे मुनाफे पर दबाव पड़ रहा है।
यूरोपीय संघ (European Union) द्वारा कीटनाशकों के लिए लागू किए गए सख्त 'मैक्सिमम रेसिड्यू लिमिट्स' (MRLs) ने भी निर्माताओं के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब एक्सपोर्टर्स को बेहतर क्वालिटी कंट्रोल और फार्मिंग प्रैक्टिस में भारी निवेश करना पड़ रहा है। आने वाले समय में कंपनियों का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि वे इन वैश्विक दबावों और कड़े नियमों को कितनी कुशलता से संभाल पाती हैं।
