देश में चीनी की खुदरा कीमतें औसतन **₹64.24** प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई हैं। सरकारी प्रयासों के बावजूद इसमें सालाना **38.63%** की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
भारत में चीनी की महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। अगस्त 2026 के अंत तक खुदरा कीमतें ₹64.24 प्रति किलो के स्तर पर आ गई हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 38.63% ज्यादा है। केवल पिछले एक महीने में ही दाम 30% तक बढ़ चुके हैं। सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की मंजूरी दी थी, लेकिन इसका असर आम लोगों की जेब पर नहीं दिख रहा है।
उत्पादन में भारी कटौती
कीमतों में इस उछाल के पीछे मुख्य कारण उत्पादन का अनुमान कम होना है। साल 2025-26 के लिए चीनी उत्पादन का लक्ष्य पहले 343 लाख टन था, जिसे घटाकर अब 306 लाख टन कर दिया गया है। खराब मौसम और फसल में बीमारियों के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है। सप्लाई कम होने के डर से बाजार में तेजी का माहौल है और आयात के बाद भी कीमतें काबू में नहीं आ रही हैं।
सरकारी रेगुलेशन का दबाव
बढ़ती महंगाई को थामने के लिए सरकार अब सख्त रुख अपना रही है। 1 सितंबर 2026 से बल्क यूजर्स के लिए 15 दिन की स्टॉक लिमिट लागू कर दी गई है ताकि जमाखोरी को रोका जा सके। इसके अलावा चीनी मिलों की बिक्री पर भी सरकार कड़ी नजर रख रही है। निवेशकों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि ऊंचे दामों के बावजूद सरकारी दखल के कारण मिलों का प्रॉफिट मार्जिन सीमित हो सकता है।
FMCG सेक्टर पर असर
चीनी के दाम बढ़ने का सीधा नकारात्मक असर FMCG कंपनियों पर पड़ रहा है। बिस्किट, मिठाई और कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली कंपनियों की लागत बढ़ गई है। अगर ये कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो उनके नेट प्रॉफिट पर दबाव आना तय है। बाजार की नजर अब आने वाले त्योहारों की मांग और नई सरकारी नीतियों के असर पर टिकी है।
