भारत ने जाम्बिया के साथ कॉपर एसेट्स हासिल करने के लिए फिर से राजनयिक बातचीत शुरू कर दी है। इसका मुख्य उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए कॉपर की निर्भरता को कम करना है। पिछली बार माइनिंग राइट्स पर विवाद के बाद बातचीत रुक गई थी, लेकिन अब सरकार ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है।
भारत सरकार ने जाम्बिया के साथ कॉपर माइनिंग एसेट्स में निवेश के लिए फिर से बातचीत शुरू कर दी है। 26 अगस्त 2026 को हुई शुरुआती चर्चाएं इस बात का संकेत हैं कि पुरानी अड़चनों को पीछे छोड़कर अब नए सिरे से साझेदारी की कोशिशें तेज हो गई हैं।
कॉपर की जरूरत और स्ट्रेटेजिक लक्ष्य
भारत के लिए कॉपर की सप्लाई चेन को मजबूत करना अब एक नेशनल प्राथमिकता बन गई है। इंडस्ट्री और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कॉपर बेहद अहम है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं—अनुमान है कि अगर भारत ने अपने दम पर कॉपर के बड़े भंडार हासिल नहीं किए, तो 2047 तक हमें अपनी जरूरत का 97% कॉपर इम्पोर्ट करना पड़ सकता है।
इसी कमी को पूरा करने के लिए KABIL (Khanij Bidesh India Ltd) दुनिया भर में प्रोजेक्ट्स की तलाश कर रही है। KABIL एक जॉइंट वेंचर है जिसमें NALCO, Hindustan Copper (HCL), और Mineral Exploration Corporation Limited (MECL) शामिल हैं।
बदली हुई रणनीति
पहले जाम्बिया के साथ बातचीत एक 9,000 वर्ग किलोमीटर के एरिया पर माइनिंग राइट्स को लेकर विवाद के कारण ठप हो गई थी। इस बार सरकार ने चालाकी से उन विवादित एरिया को बातचीत से बाहर रखा है ताकि प्रक्रिया में कोई कानूनी पेंच न फंसे और एक भरोसेमंद सप्लाई पाइपलाइन तैयार हो सके।
मार्केट का नजरिया और रिस्क
निवेशकों को यह समझना चाहिए कि यह एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक मूव है, न कि कोई इमीडिएट रेवेन्यू जनरेटर। विदेशी माइनिंग प्रोजेक्ट्स में निवेश करना हमेशा जोखिम भरा होता है, जिसमें जियो-पॉलिटिकल रिस्क और भारी कैपिटल एक्सपेंस (Capex) शामिल हैं। बाजार की नजर अब इस पर होगी कि KABIL कैसे अपनी डील को फाइनल करता है और विदेशी जमीन पर प्रोजेक्ट्स को कितनी तेजी से एग्जीक्यूट करता है।
