त्योहारी सीजन में चीनी की बढ़ती कीमतों को काबू में करने के लिए सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े के लिए **16 लाख टन** चीनी का कोटा जारी किया है। इसमें **14 लाख टन** घरेलू मिलों के लिए और **2 लाख टन** आयातकों के लिए आवंटित की गई है।
बाजार में सप्लाई बढ़ाने की कवायद
त्योहारों के दौरान चीनी की मांग में होने वाली बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार ने कीमतों को स्थिर करने के लिए कमर कस ली है। 12 अक्टूबर 2026 को खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 16 लाख टन (LMT) चीनी का कोटा आवंटित किया है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य खुले बाजार में सप्लाई बढ़ाकर एक्स-मिल कीमतों को नियंत्रित करना है, जो पिछले 10 दिनों से तेजी से बढ़ रही थीं।
डीलरों पर सख्ती और रेगुलेटरी नियम
सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए डीलरों पर भी शिकंजा कसा है। 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी नए नियमों के तहत डीलर अब अधिकतम 1,000 क्विंटल चीनी ही स्टॉक कर सकेंगे। हालांकि, कोलकाता और असम जैसे कुछ क्षेत्रों के लिए यह लिमिट 2,000 क्विंटल रखी गई है। शुगर सेक्टर में निवेश करने वाले निवेशकों को यह समझना होगा कि यह इंडस्ट्री पूरी तरह से सरकारी नियमों के अधीन है। कंपनियां अपनी मर्जी से न तो दाम बढ़ा सकती हैं और न ही मनचाहे स्तर पर स्टॉक रख सकती हैं, जिसका सीधा असर उनके कैश फ्लो और रेवेन्यू पर पड़ता है।
प्रमुख राज्यों का योगदान
इस आवंटन में महाराष्ट्र को सबसे बड़ी हिस्सेदारी 4.76 लाख टन मिली है। इसके बाद उत्तर प्रदेश को 4.51 लाख टन और कर्नाटक को 2.32 लाख टन का कोटा दिया गया है। ये तीन राज्य देश की कुल चीनी आपूर्ति में बड़ा हिस्सा रखते हैं, हालांकि छोटी मिलों को कोटा न मिलने से उनकी ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी पर दबाव बढ़ सकता है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चेतावनी
त्योहारी सीजन में मांग तो बढ़ती है, लेकिन सरकारी कोटा सिस्टम और एफआरपी (FRP) यानी गन्ना खरीद की फिक्स कीमतों के कारण मिलों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर लगातार दबाव बना रहता है। जब सरकार बिक्री की रफ्तार पर अंकुश लगाती है, तो कंपनियों के पास इन्वेंट्री का बोझ बढ़ने लगता है। निवेशकों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि कंपनियां सरकार की इन पाबंदियों के बीच अपने मार्जिन और प्रॉफिटेबिलिटी को कैसे बैलेंस करती हैं।
