सरकार ने ड्यूटी-फ्री चीनी आयात की डेडलाइन को लचीला बनाते हुए **2 महीने** की रोलिंग विंडो का ऐलान किया है। हालांकि, घरेलू मार्केट में चीनी की कीमतें **18%** तक गिर गई हैं, जिससे इम्पोर्टर्स अब अपने कदम पीछे खींच रहे हैं।
आयात के बदले नियम
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने ड्यूटी-फ्री कच्चे चीनी के आयात नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब 31 अक्टूबर, 2026 की फिक्स्ड डेडलाइन की जगह इम्पोर्टर्स को 'बिल ऑफ एंट्री' फाइल करने के बाद स्टॉक रिफाइन और बेचने के लिए 2 महीने का समय दिया जाएगा। यह फैसला ब्राजील जैसे देशों में पोर्ट कंजेशन (भीड़) की वजह से जूझ रही इंडस्ट्री को राहत देने के लिए लिया गया है।
मार्जिन पर दबाव
सरकारी राहत के बावजूद, इम्पोर्टर्स का उत्साह कम होता दिख रहा है। इसकी मुख्य वजह घरेलू एक्स-मिल चीनी कीमतों में आई 18% की गिरावट है, जो ₹67 प्रति किलो के पीक से गिरकर अब करीब ₹55 प्रति किलो पर आ गई है। इससे रिफाइनर्स का मुनाफा मार्जिन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जानकारों का मानना है कि सरकार के 1 मिलियन टन के टैरिफ-रेट कोटा (TRQ) के मुकाबले वास्तविक आयात 5 लाख टन के स्तर को छूने में भी संघर्ष कर सकता है।
नई स्टॉक लिमिट
खुदरा महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार ने बल्क कंज्यूमर्स (जो 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं) के लिए 15 दिन की स्टॉक लिमिट तय की है। यह नियम 1 सितंबर से 30 नवंबर, 2026 तक लागू रहेगा, ताकि जमाखोरी को रोका जा सके। फिलहाल रिटेल दाम अभी भी ₹63-₹64 प्रति किलो के आसपास बने हुए हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों को अब कंपनियों के रिफाइनिंग वॉल्यूम और इन्वेंट्री कॉस्ट पर नजर रखनी होगी। इसके अलावा, 2026-27 सीजन के लिए सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी भी इस सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित होगी, क्योंकि यह तय करेगी कि घरेलू बाजार में चीनी की कितनी सप्लाई बची रहेगी।
