ऊर्जा प्राथमिकताएं बदल रहीं
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत को अमेरिका से अपनी ऊर्जा, खासकर नेचुरल गैस लिक्विड्स (NGLs) की इम्पोर्ट्स बढ़ाने पर मजबूर कर रहा है। मध्य पूर्व में तेल और गैस साइट्स पर हुए हमलों के बाद यह रणनीतिक बदलाव आया है, जिसने लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) के प्रोडक्शन और शिपिंग में बाधा डाली है। भारत, जो आमतौर पर अपनी 90% एल.पी.जी. पश्चिम एशिया से इम्पोर्ट करता है, अब अपनी सप्लाई चेन के लिए बड़े जोखिम का सामना कर रहा है।
अमेरिका से NGL इम्पोर्ट्स में भारी उछाल
अमेरिका से भारत आने वाले NGLs की इम्पोर्ट्स में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है। 2016 में जहां यह आंकड़ा केवल 2,000 बैरल प्रतिदिन (b/d) था, वहीं पिछले साल यह रिकॉर्ड 139,000 बैरल प्रतिदिन (b/d) तक पहुंच गया। यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) ने बताया कि पिछले एक साल में अमेरिका से भारत को NGLs एक्सपोर्ट्स में 70,000 बैरल प्रतिदिन (b/d) यानी 101% का उछाल आया है। इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि ब्यूटेन की रही, जो 36,000 बैरल प्रतिदिन (b/d) तक पहुंच गया, और प्रोपेन का इम्पोर्ट 2025 में 41,000 बैरल प्रतिदिन (b/d) तक जा पहुंचा।
पश्चिम एशिया की सप्लाई चेन में जोखिम
पश्चिम एशिया के भारत के पारंपरिक सप्लायर, जैसे यूएई, कतर, कुवैत और सऊदी अरब, क्षेत्रीय संघर्षों से प्रभावित हुए हैं। ऊर्जा के लिए एक महत्वपूर्ण शिपिंग रूट, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) भी उच्च जोखिम पर है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि भले ही रूट फिर से खुल जाएं, फिर भी लगभग 220,000 बैरल प्रतिदिन (b/d) एल.पी.जी. एक्सपोर्ट्स लंबे समय तक बंद रह सकते हैं, जो इस क्षेत्र से होने वाली सामान्य सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा है। यह इस बात को उजागर करता है कि भारत अपने कुकिंग फ्यूल के लिए इस क्षेत्र पर लगभग पूरी तरह निर्भर होने में कितना कमजोर है।
अमेरिका की स्थिति मजबूत
Vortexa की एनालिस्ट अन्ना ज़मिंको (Anna Zhminko) जैसी राय रखती हैं कि अमेरिका कम से कम 2026 के मध्य तक एशियाई बाजारों में एक स्थिर सप्लायर बना रहेगा। अमेरिकी एक्सपोर्टर्स संभवतः अपनी कार्गो शिपमेंट्स को समायोजित करेंगे, मांग को पूरा करने के लिए अधिक ब्यूटेन जोड़ सकते हैं। हालांकि भारत को कहीं और से भी कुछ सप्लाई मिल सकती है, लेकिन मुख्य प्रयास अमेरिका से NGLs की खरीद बढ़ाने पर है, जो चल रही ट्रेड वार्ताओं से भी समर्थित है।