वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तूफानी तेजी का असर अब भारत पर भी दिख रहा है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही (Q1 FY27) में देश का कच्चा तेल आयात बिल **26%** बढ़कर **$49 अरब** (लगभग ₹4,07,000 करोड़) पर पहुंच गया, जबकि आयात वॉल्यूम में **18%** की गिरावट आई। इस बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है और तेल कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ने की आशंका है।
क्यों बढ़ा तेल आयात बिल?
हाल के हफ्तों में वेस्ट एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। इस वजह से, भले ही भारत ने Q1 FY27 में 18% कम यानी 59.7 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया (जो पिछले साल इसी अवधि में 73 मिलियन टन था), लेकिन बिल 26% बढ़कर $49 अरब हो गया।
वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें एक समय $120 प्रति बैरल के पार तक चली गई थीं। भारत अपनी ज़रूरत का करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर यहाँ की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। हॉरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों पर किसी भी व्यवधान ने जहाज़ों के किराए और बीमा लागत को और बढ़ा दिया है, जिससे कुल आयात बिल में इज़ाफ़ा हुआ है।
निवेशकों पर असर?
तेल की कीमतों में यह अस्थिरता एनर्जी सेक्टर के लिए मिली-जुली तस्वीर पेश करती है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर अपने मुनाफे को बनाए रखने का दबाव बढ़ जाता है, क्योंकि वे बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह से उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पातीं, खासकर महंगाई को काबू में रखने के सरकारी दबाव के चलते। अगर वे कीमतें नहीं बढ़ा पाईं, तो उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ेगा। वहीं, दूसरी ओर कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली कंपनियों के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती है, क्योंकि उन्हें ज़्यादा दाम मिलेंगे। हालांकि, सरकार ऐसे में विंडफॉल टैक्स (windfall tax) लगाकर मुनाफा कम कर सकती है।
मैक्रो इकोनॉमी पर भी प्रभाव
भारत का एक बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है, इसलिए जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं और रुपया कमजोर होता है, तो आयात की लागत और भी ज़्यादा बढ़ जाती है। इससे देश के व्यापार घाटे (Trade Balance) पर दबाव पड़ता है और करेंसी की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
आगे चलकर, निवेशकों को वैश्विक ब्रेंट क्रूड की कीमतों के रुझान और सरकार द्वारा खुदरा ईंधन की कीमतों को लेकर लिए जाने वाले फैसलों पर नज़र रखनी होगी। वेस्ट एशिया में जारी अनिश्चितता एक बड़ा जोखिम बनी हुई है, जो ऊर्जा की लागत को और अस्थिर कर सकती है।
