गल्फ देशों से सप्लाई में बड़ी सेंध
वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के चलते भारत के ऊर्जा आयात ढांचे में बड़ा बदलाव आया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में बढ़ते संघर्ष के कारण, जो पारंपरिक रूप से भारत की ऊर्जा सुरक्षा का आधार रहे हैं, गल्फ देशों की सप्लाई में भारी कमी आई है। कतर से LPG शिपमेंट में 77.7% की भारी गिरावट देखी गई, वहीं सऊदी अरब से भी 75.5% की कमी दर्ज की गई। अपने 33 करोड़ से ज्यादा एलपीजी उपभोक्ताओं को सप्लाई बनाए रखने के लिए भारत ने मजबूरी में अमेरिका जैसे अटलांटिक बेसिन देशों से आयात बढ़ा दिया है। अमेरिका से एलपीजी की आमद में 73% की वृद्धि हुई है। यह नया रूट भले ही तत्काल जरूरतें पूरी कर रहा हो, लेकिन इससे लॉजिस्टिक्स की मुश्किलें और इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ गई है, जिसे घरेलू बाजार झेलने की कोशिश कर रहा है।
मार्जिन पर भारी दबाव
सप्लाई का रास्ता बदलने के बावजूद, सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) की वित्तीय हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। इन कंपनियों को घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर लगभग ₹650 का अंडर-रिकवरी (नुकसान) हो रहा है। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Brent crude) की कीमतें $100 प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं और बड़े गैस वाहक जहाजों (VLGCs) का फ्रेट रेट भी महंगा हो गया है, जिससे लंबी दूरी की शिपिंग कॉस्ट बढ़ गई है। इसके बावजूद, खुदरा कीमतें न बढ़ने से ओएमसी (OMCs) अपनी कमाई गंवाकर देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रही हैं।
घरेलू मांग में गिरावट
सप्लाई की दिक्कतों के अलावा, घरेलू मांग में भी कमी देखी जा रही है। मई में एलपीजी की मांग में पिछले साल की तुलना में 19.2% की गिरावट आई है, जो पेट्रोलियम उत्पादों में सबसे बड़ी गिरावट है। इस मांग में कमी के पीछे कई कारण हैं। सरकारी बुकिंग पर लगी पाबंदियां और सप्लाई मैनेजमेंट जैसे सरकारी उपायों के अलावा, निम्न आय वर्ग के घरों पर बढ़ती महंगाई का असर साफ दिख रहा है। साथ ही, शहरी इलाकों में लोग इंडक्शन स्टोव और पाइप नेचुरल गैस (PNG) की ओर भी बढ़ रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि कई लोगों के लिए एलपीजी अब एक जरूरी सुविधा नहीं, बल्कि एक महंगा खर्च बनता जा रहा है।
संस्थागत जोखिम का खतरा
देश के अंदर एलपीजी प्रोडक्शन 52,000 टन प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद, सप्लाई का रिस्क एक बड़ा खतरा बना हुआ है। सरकार के निर्देश पर 30 दिन का रिजर्व स्टॉक बनाने का लक्ष्य ओएमसी (OMCs) पर बड़ा वर्किंग कैपिटल बोझ डाल रहा है, जो पहले से ही ऊंचे खरीद दामों से जूझ रही हैं। अगर भू-राजनीतिक तनाव जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहती हैं, तो अमेरिकी स्पॉट मार्केट से महंगे कार्गो पर निर्भरता भारतीय कंपनियों को बड़े प्राइस स्विंग का शिकार बना सकती है। प्राइवेट कंपनियों के विपरीत, जो अपनी कीमतें आसानी से बदल सकती हैं, सरकारी कंपनियां राजनीतिक फैसलों से बंधी हैं। अगर सरकार समय पर नुकसान की भरपाई नहीं करती है, तो उन्हें भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है, जो उनके बुक वैल्यू को भी प्रभावित कर सकता है।
