ग्लोबल मार्केट में डीजल की कमी के बीच भारत के पेट्रोलियम एक्सपोर्ट ने पिछले **12-तिमाही** का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इस उछाल ने भारत के ट्रेड बैलेंस को बड़ी राहत दी है और कच्चे तेल के इंपोर्ट बिल का करीब **एक-तिहाई** हिस्सा कवर कर लिया है।
जुलाई-सितंबर तिमाही में भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट 12-तिमाही के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल एक्सपोर्ट वैल्यू में इन प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 11.2% रही। इस दौरान भारतीय रिफाइनर्स ने ग्लोबल मांग को पूरा करने के लिए 1.51 करोड़ टन ईंधन, मुख्य रूप से डीजल और जेट फ्यूल का निर्यात किया।
एक्सपोर्ट में इस उछाल की वजह
इस तेजी के पीछे दुनिया भर में 'मिडल डिस्टिलेट्स' (डीजल और जेट फ्यूल) की भारी किल्लत है। रेड सी में शिपिंग संकट, रूस में रिफाइनरी का कामकाज प्रभावित होना और चीन की तरफ से आउटपुट मैनेजमेंट जैसे कारणों से ग्लोबल मार्केट से करीब 80 लाख बैरल प्रतिदिन की रिफाइनिंग क्षमता बाहर हो गई है। इससे सिंगापुर और यूरोप जैसे हब्स में ईंधन के दाम ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर हैं।
इकोनॉमी के लिए बना सुरक्षा कवच
भारत के लिए यह एक्सपोर्ट बूम एक बड़े आर्थिक बफर के रूप में काम आया है। दूसरी तिमाही के दौरान भारत ने $14.8 अरब की कमाई एक्सपोर्ट से की, जिसने $47.4 अरब के कुल क्रूड और प्रोडक्ट इंपोर्ट बिल के बोझ को काफी कम कर दिया। रिफाइनिंग कंपनियों के लिए क्रूड की लागत और प्रोडक्ट प्राइस के बीच का अंतर, जिसे 'क्रैक स्प्रेड' कहा जाता है, इस दौरान काफी फायदेमंद रहा है, जिससे उनके मार्जिन में सुधार हुआ है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को इस कमाई को स्थायी बदलाव नहीं मानना चाहिए। रिफाइनिंग प्रॉफिटेबिलिटी पूरी तरह से ग्लोबल डिमांड और सप्लाई पर टिकी है। यह मुनाफा अस्थायी सप्लाई संकट और भू-राजनीतिक तनावों का नतीजा है। यदि रिफाइनरी ऑपरेशंस नॉर्मल होते हैं या शिपिंग रूट सुधरते हैं, तो मार्जिन में दबाव आना तय है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, 2027 के अंत तक सप्लाई टाइटनेस बनी रह सकती है, जिससे मार्केट में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा।
