अप्रैल महीने में भारत के ऑयलमील एक्सपोर्ट्स में भारी गिरावट दर्ज की गई है। शिपिंग में आ रही दिक्कतों और साउथ अमेरिकन देशों से सस्ते दाम के चलते भारतीय सोयाबीन मील की मांग कम हुई है। हालांकि, चीन से मिली बढ़त के कारण रेपसीड मील के एक्सपोर्ट्स में इजाफा देखा गया है, लेकिन हाई फ्रेट कॉस्ट (Freight Cost) के चलते ओवरऑल एक्सपोर्ट्स की तस्वीर अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
शिपिंग की मार, एक्सपोर्ट्स पर बड़ी गिरावट
अप्रैल के महीने में भारत के ऑयलमील एक्सपोर्ट्स (Oilmeal Exports) को बड़ा झटका लगा है। पिछले साल के मुकाबले इस बार एक्सपोर्ट्स में 21.5% की भारी गिरावट आई है, जो 4.65 लाख टन से घटकर 3.65 लाख टन पर आ गई है। यह गिरावट ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) में आ रही दिक्कतों और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय एग्री एक्सपोर्ट्स (Agri Exports) की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) को दर्शाती है।
सोयाबीन मील की कीमतें बनीं रोड़ा
सबसे ज्यादा गिरावट सोयाबीन मील के एक्सपोर्ट्स में देखी गई है। पिछले साल जहां 2.30 लाख टन सोयाबीन मील एक्सपोर्ट हुआ था, वहीं इस बार यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 62,844 टन रह गया है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Solvent Extractors' Association of India) के अनुसार, भारतीय एक्सपोर्टर्स साउथ अमेरिका के प्रोड्यूसर्स (Producers) से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा के आगे टिक नहीं पा रहे हैं। भारतीय सोयाबीन मील का फ्री ऑन बोर्ड (Free on Board) प्राइस $605 प्रति टन है, जबकि इंटरनेशनल मार्केट्स में यह $430 प्रति टन (जैसे रॉटरडैम में) के भाव पर मिल रहा है। इस बड़े प्राइस गैप (Price Gap) के चलते भारतीय सोयाबीन मील खरीदारों के लिए कम आकर्षक रह गया है।
रेड सी का संकट बना बड़ी बाधा
एक्सपोर्ट्स में सुस्ती की एक और बड़ी वजह रेड सी (Red Sea) में चल रहा शिपिंग संकट है। इस संकट के कारण जहाजों को स्वेज कैनाल (Suez Canal) से जाने के बजाय केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) का लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है। इससे माल ढुलाई की लागत (Freight Costs) में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे एक्सपोर्टर्स पर वित्तीय बोझ बढ़ा है। यूरोप (Europe) और वेस्ट एशिया (West Asia) जैसे भारत के पारंपरिक बाजारों में शिपमेंट का समय बढ़ने से कारोबार प्रभावित हुआ है।
चीन से आई रेपसीड मील की मांग
हालांकि, कुल मिलाकर एक्सपोर्ट्स घटे हैं, लेकिन रेपसीड मील (Rapeseed Meal) के एक्सपोर्ट्स में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है। यह 2.13 लाख टन से बढ़कर 2.48 लाख टन पर पहुंच गया है। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण चीन (China) से मिली मजबूत मांग रही है। चीन ने अप्रैल में 1.42 लाख टन भारतीय ऑयलमील्स का आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा सिर्फ 59,921 टन था। चीन की यह मांग इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा सहारा बनी है।
भविष्य की राह
आगे चलकर ऑयलमील एक्सपोर्ट्स की रिकवरी कई फैक्टर्स पर निर्भर करेगी। पोल्ट्री (Poultry) और डेयरी (Dairy) इंडस्ट्री से घरेलू मांग से कुछ सहारा मिलने की उम्मीद है। लेकिन, एक्सपोर्ट्स पर हाई फ्रेट रेट्स और साउथ अमेरिका से मिल रही प्रतिस्पर्धा का दबाव बना रहेगा। ऐसे में, मॉनसून की प्रगति, देश में फसल की उपलब्धता और रेड सी शिपिंग में किसी भी तरह की राहत पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कीमत के मामले में कॉम्पिटिटिव बने रहना ही आने वाले महीनों में एक्सपोर्ट वॉल्यूम (Export Volume) तय करेगा।
