ऑयल कंपनियों पर भारी घाटा
सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) काफी समय से वित्तीय दबाव झेल रही थीं। अनुमानों के मुताबिक, वे पेट्रोल पर प्रतिदिन लगभग ₹20 प्रति लीटर और डीज़ल पर लगभग ₹100 प्रति लीटर का घाटा उठा रही थीं। यह घाटा वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और पिछले लगभग चार सालों से खुदरा (retail) ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने के सरकारी फैसले के कारण था।
भू-राजनीतिक तनाव से कच्चे तेल में उछाल
यह मूल्य समायोजन (price adjustment) वैश्विक कच्चे तेल बाजारों में आई भारी तेजी के बाद हुआ है। शुरुआती कारोबार में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड लगभग 0.84% बढ़कर $102.01 प्रति बैरल हो गया, जबकि ब्रेंट क्रूड 0.83% चढ़कर $106.59 प्रति बैरल पर पहुंच गया। फरवरी के अंत से तेल की कीमतों में कुल मिलाकर 40% से अधिक की वृद्धि हुई है। पश्चिम एशिया में लगातार बने भू-राजनीतिक तनाव आपूर्ति में बाधाओं को लेकर चिंताएं बढ़ा रहे हैं, जिससे भारत जैसे देशों के लिए आयात लागत बढ़ रही है।
प्रमुख शहरों में नई ईंधन कीमतें
राष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में बढ़ोतरी के बाद, दिल्ली में पेट्रोल अब ₹97.77 प्रति लीटर और डीज़ल ₹90.67 प्रति लीटर बिक रहा है। कोलकाता में पेट्रोल ₹108.74 और डीज़ल ₹95.13 है, जबकि चेन्नई में पेट्रोल की कीमत ₹103.67 और डीज़ल की ₹95.25 है। राज्य-वार वैट (VAT) दरों के कारण पूरे देश में कीमतें अलग-अलग हैं।
बढ़ोतरी का समय और राजनीतिक पहलू
ईंधन की कीमतों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब हाल ही में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं। ऐतिहासिक रूप से, महत्वपूर्ण राजनीतिक आयोजनों से पहले ईंधन की कीमतों में कटौती देखी गई है, जैसे कि 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले ₹2 प्रति लीटर की कटौती। हालांकि, ईंधन की कीमतें तकनीकी रूप से विनियमित (deregulated) हैं और इन्हें दैनिक आधार पर वैश्विक बाजारों व मुद्रा दरों के अनुसार समायोजित किया जाना चाहिए, लेकिन वास्तविक मूल्य समायोजन अक्सर राजनीतिक कारकों से प्रभावित होते रहे हैं।
व्यापक आर्थिक प्रभाव की उम्मीद
OMCs पर सीधे प्रभाव के अलावा, ईंधन की कीमतों में वृद्धि से व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ने की उम्मीद है। डीज़ल की बढ़ी कीमतों के कारण ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की परिचालन लागत (operating costs) बढ़ेगी। एविएशन कंपनियों को भी अपने ईंधन खर्चों पर अधिक बारीकी से नजर रखनी होगी। इससे वस्तुओं और सेवाओं की कुल कीमतें बढ़ने की संभावना है।
निवेशक OMCs के शेयर प्रदर्शन, भविष्य की सरकारी नीतियों, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखेंगे। ऊर्जा क्षेत्र अब बाजार के लिए एक प्रमुख फोकस है।