तेल की राह में 'waiver' का सहारा
'पिंग शुन' नाम का एक टैंकर (Tanker) ईरान से लगभग 600,000 बैरल कच्चे तेल (Crude Oil) लेकर भारत के वडिनार पोर्ट (Vadinar Port) की ओर बढ़ रहा है। यह शिपमेंट 4 अप्रैल के आसपास पोर्ट पर पहुंचने की उम्मीद है। यह सब संभव हो पाया है अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasury) की ओर से मिली एक अस्थायी लाइसेंस या 'waiver' के कारण, जो 19 अप्रैल तक लागू है। यह 'waiver' 20 मार्च तक जहाजों पर मौजूद ईरानी तेल के लेन-देन की इजाजत देता है।
पेमेंट का पेच: SWIFT की दिक्कत
इस शिपमेंट के आने का रास्ता साफ होने के बावजूद, भारत और ईरान के बीच तेल के नियमित कारोबार में सबसे बड़ी रुकावट पेमेंट का तरीका है। ईरान और उसके बैंक इंटरनेशनल पेमेंट सिस्टम SWIFT से बाहर हैं। इस वजह से, वित्तीय लेन-देन में भारी दिक्कतें आती हैं। पुराने पेमेंट के तरीके भी अब काम नहीं कर रहे हैं, जिससे भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के लिए तेल खरीदना मुश्किल हो रहा है। एक स्पष्ट और स्थिर पेमेंट सिस्टम के बिना, लगातार आयात पर सवाल बना हुआ है।
एनर्जी सिक्योरिटी की तलाश
भारत अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता है (लगभग 5.5-5.6 मिलियन बैरल रोजाना)। ऐसे में, भारत लगातार एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) के लिए तेल के नए और विविध स्रोत तलाश रहा है। पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की कीमतों में उठा-पटक के बीच, यह कदम भारत की ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है। इस साल भारत ने रूस से भी तेल आयात बढ़ाया है (जो अब 37% तक पहुंच गया है) और इराक, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका से भी ज्यादा खरीद कर रहा है।
पुराने दाम, नई कीमतें?
2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरान से तेल खरीदना बंद करना पड़ा था। तब ईरान अक्सर अच्छी डील देता था, जिसमें शिपिंग सस्ती होती थी और पेमेंट के लिए लंबा समय मिलता था। ईरानी तेल की कीमतें अक्सर ग्लोबल कीमतों से डिस्काउंट (Discount) पर मिलती थीं, जो चीन जैसी बड़ी खरीदारों के लिए बड़ा आकर्षण था। हालांकि, हालिया सप्लाई दिक्कतों के कारण, इन डिस्काउंट में कमी आई है। अब ईरान की कीमतें ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के करीब चल रही हैं, जो फिलहाल लगभग $106.73 प्रति बैरल है। इसका मतलब है कि पहले जैसा बड़ा प्राइस एडवांटेज (Price Advantage) अब शायद न मिले।
रिफाइनरी कंपनियों के लिए आगे की राह
अमेरिकी 'waiver' के बावजूद, प्रैक्टिकल दिक्कतें बनी हुई हैं। मुख्य समस्या पेमेंट की है, जो लेन-देन में जोखिम पैदा करती है। वहीं, चीन ईरान के तेल का 90% से ज्यादा आयात करता है, जिससे नए खरीदारों के लिए गुंजाइश कम हो जाती है। भारतीय रिफाइनरी कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (Indian Oil Corporation - IOC) और भारत पेट्रोलियम (Bharat Petroleum - BPCL) अभी कम प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेशियो (लगभग 5.3-6.4x) पर ट्रेड कर रही हैं, जो यह दिखाता है कि निवेशक इन्हें स्थिर, मुनाफे वाली कंपनियां मानते हैं, न कि हाई-ग्रोथ वाली। दूसरी ओर, रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) का P/E रेशियो 21-23x है, जो इसे एक बड़ी और विविध कंपनी के तौर पर दिखाता है। ईरानी तेल पर कम डिस्काउंट और 'waiver' की अस्थायी प्रकृति का मतलब है कि भारतीय रिफाइनरी के लिए तत्काल मुनाफा कम हो सकता है, खासकर जब उन्होंने डिस्काउंट पर रूसी तेल खरीदना बढ़ाया था।
भविष्य की ओर
'पिंग शुन' टैंकर की यात्रा वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ी पॉलिसी बदलाव का नतीजा है। भारत का फोकस ऊर्जा सुरक्षा पर बना रहेगा, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से तेल की सोर्सिंग, पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और सभी किफायती विकल्पों को खोजना शामिल है। ईरान के साथ स्थायी व्यापार के लिए पेमेंट की कठिनाइयों को दूर करना सबसे महत्वपूर्ण होगा, खासकर तब जब मध्य पूर्व में तनाव वैश्विक तेल बाजारों को प्रभावित कर रहा है।