भारत के माइनिंग सेक्टर का बड़ा लक्ष्य
भारत का माइनिंग सेक्टर (Mining Sector) आने वाले समय में इकॉनमी को बड़ी रफ्तार देने के लिए तैयार है। अनुमान है कि यह 2047 तक देश के GDP में $500 अरब का इजाफा कर सकता है और 25 मिलियन (2.5 करोड़) नई नौकरियां पैदा कर सकता है। Deloitte-ICC की हालिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है, जो भारत के $30 ट्रिलियन की इकॉनमी बनने के लक्ष्य का समर्थन करती है।
यह सेक्टर अब 'माइनिंग 4.0' (Mining 4.0) से आगे बढ़कर 'माइनिंग 5.0' (Mining 5.0) की ओर बढ़ रहा है। इसमें टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के साथ-साथ वैल्यू-ड्रिवन (value-driven) और लोगों पर केंद्रित माइनिंग ऑपरेशंस (mining operations) पर जोर होगा। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), एकीकृत डिजिटल सिस्टम (integrated digital systems) और सस्टेनेबल प्रैक्टिसेस (sustainable practices) पर बहुत निर्भर करेगा। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, क्लीन एनर्जी (clean energy) के लक्ष्यों और मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वजह से मिनरल्स की बढ़ती डिमांड इस ग्रोथ को और बढ़ाएगी।
डिजिटल खाई को समझना: क्या है असली दिक्कत?
बिखरे हुए डिजिटल टूल्स का अभाव
कई भारतीय माइनिंग कंपनियां 'माइनिंग 4.0' टूल्स का इस्तेमाल तो कर रही हैं, लेकिन Deloitte-ICC रिपोर्ट के अनुसार, एक बड़ी समस्या यह है कि डिजिटल क्षमताएं अभी भी बिखरी हुई हैं। इसका मतलब है कि डिजिटल टूल्स पर भले ही काफी खर्च किया जा रहा हो, लेकिन इसका फायदा पूरी कंपनी में व्यापक रूप से नहीं हो पा रहा है, सिर्फ छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स ही सफल हो रहे हैं।
भारत के लिए असली मौका नई टेक्नोलॉजी अपनाने में नहीं, बल्कि मौजूदा क्षमताओं को मिलाकर एक बेहतर ढंग से समन्वित, एकीकृत ऑपरेटिंग सिस्टम (integrated operating systems) तैयार करने में है। नेशनल जियोसाइंस डेटा रिपॉजिटरी (NGDR) और यूनिफाइड माइनिंग पोर्टल (Unified Mining Portal) जैसे मौजूदा राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। लेकिन, इनका पूरा फायदा तभी उठाया जा सकता है जब ये कॉमन इंटरफेस (common interfaces) के जरिए मिलकर काम करें और एक सेंट्रल इंटेलिजेंस सिस्टम (central intelligence system) बना सकें।
वैश्विक तुलना और ऐतिहासिक चुनौतियां
डिजिटल मैच्योरिटी (digital maturity) और आर्थिक योगदान के मामले में भारत का माइनिंग सेक्टर ग्लोबल लीडर्स से पीछे है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश AI, ऑटोमेशन (automation) और एडवांस डिजिटल मैनेजमेंट सिस्टम (advanced digital management systems) का उपयोग करके काफी आगे निकल चुके हैं। वहां के डिजिटल इकोसिस्टम (digital ecosystems) ज्यादा विकसित हैं और एनवायर्नमेंटल, सोशल और गवर्नेंस (ESG) प्रैक्टिसेस पर भी ज्यादा फोकस है।
उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया तेजी से AI और ऑटोमेशन को इंटीग्रेट कर रहा है, जिससे एडवांस डिजिटल माइनिंग सॉल्यूशंस (advanced digital mining solutions) की डिमांड बढ़ रही है। भारत का माइनिंग सेक्टर जहां GDP में करीब 1.75-2.5% का योगदान देता है, वहीं साउथ अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश क्रमश: 7.5% और 6.99% का योगदान करते हैं। यह भारत की विशाल खनिज संपदा के बावजूद, सीधे आर्थिक प्रभाव में एक बड़े अंतर को दर्शाता है। ऐतिहासिक रूप से, इस सेक्टर ने भ्रष्टाचार, ऑपरेशनल इनएफिशिएंसी (operational inefficiencies), पर्यावरणीय मुद्दों और जटिल रेगुलेशन (regulations) जैसी समस्याओं से संघर्ष किया है, जिसने इसकी पूरी क्षमता तक पहुंचने और बड़े निवेश को आकर्षित करने की क्षमता को सीमित किया है।
मुख्य प्रोत्साहन और नई टेक्नोलॉजी
भारत के माइनिंग सेक्टर को आगे बढ़ाने के लिए कई फैक्टर काम कर रहे हैं। इनमें नेशनल मिनरल पॉलिसी 2019 (National Mineral Policy 2019) और माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट 2021 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2021) जैसे महत्वपूर्ण पॉलिसी रिफॉर्म्स (policy reforms) शामिल हैं। सरकार की 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) पहल, साथ ही इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और क्लीन एनर्जी के लिए जरूरी स्टील और क्रिटिकल मिनरल्स (critical minerals) की मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, ग्रोथ के लिए बड़े प्रोत्साहन दे रही है।
ऑपरेशंस को बदलने वाली प्रमुख टेक्नोलॉजीज में AI-आधारित सेफ्टी प्रेडिक्शन सिस्टम (AI-based safety prediction systems), डिजिटल ट्विन्स (digital twins), ऑटोमेटेड ऑपरेशंस (automated operations), रियल-टाइम मॉनिटरिंग (real-time monitoring) और हाइब्रिड क्लाउड/एज डिजिटल सेटअप (hybrid cloud/edge digital setups) शामिल हैं। जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (National Critical Mineral Mission) भी इन महत्वपूर्ण रिसोर्सेज को सुरक्षित करने के रणनीतिक महत्व पर जोर देता है।
'माइनिंग 5.0' की राह में बड़ी बाधाएं
इंटीग्रेशन की चुनौती
'माइनिंग 5.0' में सफलतापूर्वक आगे बढ़ना सिर्फ एक टेक्निकल अपग्रेड नहीं, बल्कि लीडरशिप की प्राथमिकता है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां कैसे गहराई से अपने ऑपरेशंस को बदलती हैं, जहां मात्रा से ज्यादा वैल्यू (value) को पुरस्कृत किया जाए और AI व डेटा को महत्वपूर्ण बिजनेस टूल्स (business tools) के रूप में देखा जाए।
मुख्य बाधाओं में रिमोट साइट्स (remote sites) पर खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी (connectivity) शामिल है, जिसके लिए लोकल कंप्यूटिंग पावर (edge computing) में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। पुरानी ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी (OT) सिस्टम्स को मॉडर्न IT प्लेटफॉर्म्स (IT platforms) के साथ काम करवाना भी एक चुनौती है, क्योंकि लिगेसी सिस्टम्स (legacy systems) में सुधार की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा, मौजूदा माइनिंग वर्कफोर्स (workforce) और ह्यूमन-AI कोलैबोरेशन (human-AI collaboration) की जरूरतों के बीच स्किल्स का एक बड़ा गैप है, जिसके लिए व्यापक ट्रेनिंग प्रोग्राम्स (training programs) की जरूरत होगी। भारत को उन देशों के मुकाबले इन गहरी इंटीग्रेशन समस्याओं को दूर करने में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय संसाधन ज्यादा एडवांस हैं।
सस्टेनेबिलिटी नियम और नौकरशाही
नए एनवायर्नमेंटल, सोशल और गवर्नेंस (ESG) नियम अब सस्टेनेबिलिटी (sustainability) को एक अनिवार्य, डेटा-संचालित आवश्यकता बना रहे हैं, न कि केवल एक स्वैच्छिक प्रयास। SEBI के बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (BRSR) जैसे फ्रेमवर्क इस प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं। लक्ष्य है कि रोजमर्रा के ऑपरेशंस में सस्टेनेबिलिटी को रियल-टाइम डेटा और स्पष्ट मेट्रिक्स (metrics) का उपयोग करके इंटीग्रेट किया जाए।
हालांकि, ये नियम कितनी अच्छी तरह काम करेंगे, यह डेटा और गवर्नेंस को पूरी प्रक्रिया में सुचारू रूप से इंटीग्रेट करने पर निर्भर करेगा। जबकि पारदर्शिता और आसान बिजनेस ऑपरेशंस के लिए रिफॉर्म्स के साथ रेगुलेटरी एनवायर्नमेंट (regulatory environment) सुधर रहा है, फिर भी अप्रूवल्स (approvals) प्राप्त करने में नौकरशाही देरी (bureaucratic delays) प्रोजेक्ट्स को धीमा कर सकती है।
आउटलुक: क्षमता को साकार करना
भारत के माइनिंग सेक्टर में 2047 तक GDP में $500 अरब जोड़ने और 25 मिलियन नौकरियां बनाने की जबरदस्त क्षमता है, लेकिन यह सब डिजिटल इंटीग्रेशन और ऑपरेशनल बदलावों की जटिल चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटने पर निर्भर करेगा। सरकारी समर्थन, प्रमुख मिनरल्स की मजबूत डिमांड और टेक्नोलॉजिकल प्रगति इसमें मदद करेगी।
हालांकि, आगे का रास्ता सिर्फ टेक्नोलॉजी अपनाने से कहीं बढ़कर है; लीडरशिप को एक लर्निंग कल्चर (learning culture) को बढ़ावा देने, स्किल्स गैप को पाटने और बिखरे हुए डिजिटल टूल्स को एक एकीकृत, वैल्यू-फोकस्ड सिस्टम (value-focused system) में एक साथ लाने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। इस संयुक्त प्रयास के बिना, 'माइनिंग 5.0' के महत्वाकांक्षी लक्ष्य केवल उम्मीदें बनकर रह सकते हैं, जो ग्लोबल प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाएंगे, जो डिजिटल रूप से कहीं अधिक एडवांस हैं।
