Met Coke Imports: नई ड्यूटी का असर बेअसर, भारत में रिकॉर्ड 60 लाख टन आयात

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AuthorNeha Patil|Published at:
Met Coke Imports: नई ड्यूटी का असर बेअसर, भारत में रिकॉर्ड 60 लाख टन आयात

भारत का मेट कोक (Metallurgical Coke) आयात इस साल रिकॉर्ड **60 लाख मीट्रिक टन** तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार द्वारा एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने के बावजूद इसमें **32%** का इजाफा हुआ है, जिसके पीछे घरेलू उत्पादन में कमी और पिग आयरन एक्सपोर्टर्स को मिलने वाली टैक्स छूट मुख्य वजह हैं।

जुलाई 2026 में सरकार ने मेट कोक पर 5 साल के लिए एंटी-डंपिंग ड्यूटी लागू की थी, जिसका मकसद विदेशी माल पर लगाम लगाना था। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इस साल आयात में 32% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो यह साफ बताती है कि नए टैरिफ घरेलू सप्लाई और मांग के बीच के गैप को भरने में नाकाफी साबित हुए हैं।

क्यों नहीं रुक रहा आयात?

समस्या की जड़ है घरेलू उत्पादन में कमी। भारत में मेट कोक का उत्पादन केवल 6% सालाना की दर से बढ़ रहा है, जो बढ़ती औद्योगिक मांग के मुकाबले बहुत कम है। ऐसे में कंपनियों के पास विदेश से माल मंगाने के अलावा कोई चारा नहीं है। खास तौर पर इंडोनेशिया से अब तक 21 लाख टन मेट कोक आयात किया जा चुका है।

इसके अलावा, पिग आयरन एक्सपोर्टर्स के लिए मौजूद 'Duty Exemption' यानी टैक्स छूट ने खेल बदल दिया है। अगर कोक का इस्तेमाल पिग आयरन बनाकर एक्सपोर्ट करने में होता है, तो कंपनियों को ड्यूटी नहीं देनी पड़ती। इस छूट की वजह से विदेशी कोक, भारतीय कोक के मुकाबले सस्ता पड़ रहा है। अमेरिका में भारतीय पिग आयरन की भारी मांग को देखते हुए कंपनियां अपना उत्पादन घटाने के बजाय आयात जारी रख रही हैं।

स्टील कंपनियों की बढ़ती टेंशन

निवेशकों के लिए खतरे की घंटी है 'Input Cost'। अगस्त 2026 में मेट कोक की कीमत ₹35,850 प्रति टन तक पहुंच गई थी, जो पिछले साल के मुकाबले 24% महंगी है। ग्लोबल लेवल पर कोकिंग कोल के दाम बढ़ने से स्टील कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ रहा है। अगर स्टील की कीमतें इसी अनुपात में नहीं बढ़ती हैं, तो कंपनियों का नेट प्रॉफिट और भी दबाव में आ सकता है।

आगे की चुनौतियां

बाजार के जानकारों को अब दो बड़े रिस्क पर नजर रखनी चाहिए:

  1. रेगुलेटरी बदलाव: अगर सरकार पिग आयरन एक्सपोर्टर्स को दी गई टैक्स छूट वापस लेती है, तो एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों का गणित बिगड़ सकता है।
  2. सप्लाई चेन का रिस्क: इंडोनेशिया जैसे चुनिंदा देशों पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी भू-राजनीतिक बदलाव के समय सप्लाई को बाधित कर सकती है।
Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.