भारत के शिपिंग मंत्रालय ने Reliance Industries को एक खास, एक बार की छूट (one-time exemption) दी है। इसके तहत ईरान से कच्चा तेल (crude oil) ला रहे चार जहाज भारत के Sikka पोर्ट पर रुक सकेंगे। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अमेरिका के ट्रेजरी विभाग का ईरान पर तेल प्रतिबंधों (Sanctions) से जुड़ा अस्थायी वेवर (waiver) 19 अप्रैल को खत्म होने वाला है।
Reliance पर मंडराया Sanctions का खतरा?
जिन चार जहाजों को यह मंजूरी मिली है, उनमें Comoros-flagged Kaviz, Curacao-flagged Lenore, और Iran-flagged Felicity व Hedy शामिल हैं। खास बात यह है कि ये सभी जहाज 20 साल से ज्यादा पुराने हैं और आमतौर पर इन्हें कड़े समुद्री योग्यता (seaworthiness) जांच से गुजरना पड़ता है। इनमें से कुछ जहाज 'शैडो फ्लीट' (shadow fleet) का हिस्सा हैं, जिन पर अंतर्राष्ट्रीय बीमा (international insurance) का भी भरोसा कम होता है। Reliance के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना होगा कि इन जहाजों से कच्चा तेल निकालने की प्रक्रिया पूरी तरह से अमेरिकी प्रतिबंधों और भारतीय समुद्री नियमों के तहत हो।
एनर्जी सिक्योरिटी और कंप्लायंस की मुश्किल डगर
यह स्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा (energy security) और भू-राजनीतिक दबावों (geopolitical pressures) के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दर्शाती है। ग्लोबल ऑयल मार्केट फिलहाल अस्थिर है, Brent क्रूड लगभग $96 प्रति बैरल और WTI $97.84 के आसपास ट्रेड कर रहा है। ऐसे में, भारत जैसे बड़े तेल उपभोक्ता देश के लिए अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाना (diversify) बहुत जरूरी है। Reliance हाल ही में Venezuela से क्रूड खरीदने का लाइसेंस भी हासिल कर चुकी है और रूस से आयात को भी नियमों के तहत ढाल रही है।
Reliance के लिए यह फैसला कई जोखिमों से भरा है। सबसे पहले, अमेरिकी प्रतिबंधों का वेवर 19 अप्रैल को समाप्त हो रहा है, जिससे लेन-देन के लिए बहुत कम समय बचा है। जहाजों की पुरानी स्थिति और उन पर लगे प्रतिबंधों के कारण भारत के बाहर बीमा कंपनियों और बंदरगाह अधिकारियों के साथ समस्याएँ आ सकती हैं। Reliance को कड़े कंप्लायंस (compliance) का पालन करना ही होगा, वर्ना भारी जुर्माने और प्रतिष्ठा को नुकसान का खतरा है, जो रियायती ईरानी क्रूड के फायदे को खत्म कर सकता है। यह छूट सिर्फ एक बार के लिए है, और भविष्य में ऐसी सुविधा मिलेगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। यह पूरा मामला एनर्जी मार्केट, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और राष्ट्रीय ऊर्जा लक्ष्यों के बीच जटिल तालमेल को उजागर करता है।