India Iron Ore Imports: 7 साल का रिकॉर्ड टूटा, स्टील सेक्टर पर क्या होगा असर?

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AuthorNeha Patil|Published at:
India Iron Ore Imports: 7 साल का रिकॉर्ड टूटा, स्टील सेक्टर पर क्या होगा असर?

वित्तीय वर्ष 2026 में भारत का आयरन ओर (Iron Ore) आयात 7 साल के उच्चतम स्तर **1.235 करोड़ टन** पर पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह घरेलू स्तर पर हाई-ग्रेड ओर की सप्लाई की कमी और स्टील की बढ़ती मांग है।

क्यों बढ़ा आयात?

भारत में अब 7 साल के मुकाबले सबसे ज्यादा आयरन ओर का आयात हो रहा है। वित्तीय वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, यह इंपोर्ट 1.235 करोड़ टन तक पहुंच गया है। यह दिखाता है कि देश में स्टील बनाने के लिए जरूरी हाई-ग्रेड ओर की किल्लत है, और स्थानीय खदानें मांग पूरी नहीं कर पा रही हैं।

स्टील कंपनियों पर दोहरी मार

इस इंपोर्ट पर निर्भरता का सीधा असर JSW Steel जैसी बड़ी स्टील कंपनियों पर पड़ रहा है, क्योंकि इससे उनकी इनपुट कॉस्ट (Input Cost) बढ़ गई है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि स्टील प्रोडक्शन में कोई कमी नहीं आई है। अप्रैल-जुलाई 2026 के बीच कच्चे स्टील का उत्पादन 2.6% बढ़कर 5.63 करोड़ टन हो गया।

इसके बावजूद, विदेशी कच्चे माल पर निर्भरता कंपनियों को ग्लोबल प्राइस वोलेटिलिटी (Global Price Volatility) और शिपिंग लागत के जोखिम में डालती है, जो उनके मुनाफे पर दबाव बना सकती है।

सरकार का नया दांव: MMDR अमेंडमेंट बिल

इस सप्लाई की दिक्कत को दूर करने के लिए सरकार ने 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में MMDR अमेंडमेंट बिल पेश किया है। इसका मकसद माइनिंग ऑपरेशन्स पर फाइनेंशियल बोझ कम करना और स्थानीय माइनर्स की बिजनेस को बेहतर बनाना है। सरकार का लक्ष्य है कि घरेलू प्रोडक्शन बढ़े और इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो, लेकिन यह कब तक होगा, यह देखना बाकी है।

फिर भी मजबूत प्रदर्शन

महंगी रॉ मैटेरियल कॉस्ट के बावजूद, स्टील कंपनियां मजबूती दिखा रही हैं। Q1 FY27 में कई कंपनियों ने EBITDA मार्जिन को बनाए रखा है, जिसका कारण ऑपरेशनल एफिशिएंसी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की बिक्री है। कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट मिक्स को बदलकर इंपोर्ट ओर और कोकिंग कोल की लागत को कुछ हद तक मैनेज किया है।

आगे क्या?

आगे चलकर कुछ जोखिम बने हुए हैं। मिडिल ईस्ट जैसे क्षेत्रों में जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tensions) शिपिंग लागत को बढ़ा सकती है। वहीं, अगर घरेलू स्टील प्राइस और इंपोर्ट प्राइस के बीच का अंतर कम होता है, तो कंपनियों के लिए बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डालना मुश्किल हो सकता है। निवेशकों को स्टील कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए, खासकर यह देखने के लिए कि कंपनियां इनपुट कॉस्ट महंगाई को प्रोडक्शन टारगेट के साथ कैसे संतुलित करती हैं और नए माइनिंग रिफॉर्म्स का क्या असर होता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.