साल 2026 की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत में सोने की मांग में वॉल्यूम के हिसाब से **6%** की गिरावट आई, जिससे यह **131 टन** रहा। हालांकि, रिकॉर्ड सोने की कीमतों के कारण कुल खर्च एक ऐतिहासिक ऊंचाई पर **₹1.98 लाख करोड़** पहुंच गया।
सोने के दाम आसमान पर, खर्च भी रिकॉर्ड पर
अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में भारत के सोने के बाज़ार में एक बड़ा बदलाव देखा गया। जहां सोने की कीमतों ने खरीदे गए सोने के वज़न को कम कर दिया, वहीं कुल खर्च एक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। मांग में 6% की सालाना गिरावट आई और यह 131 टन रहा, लेकिन सोने पर कुल खर्च ₹1.98 लाख करोड़ तक पहुंच गया। ऐसा घरेलू सोने की कीमतों में लगभग 59% की वृद्धि के कारण हुआ, जो कि पिछले साल की तुलना में काफी ज़्यादा है। यह वृद्धि करेंसी में गिरावट और मई के मध्य में इंपोर्ट ड्यूटी में बदलाव के कारण हुई।
कंज्यूमर की बदलती आदतें
त्योहारी सीजन और शादी के मौसम के चलते ज्वेलरी की मांग में 14% की बढ़ोतरी हुई और यह 75 टन तक पहुंच गई। हालांकि, यह पिछले साल के आंकड़ों से कम है, और पिछले दो दशकों की दूसरी तिमाही में यह ज्वेलरी की मांग के सबसे कमजोर दौरों में से एक रहा। ज़्यादा कीमत होने के बावजूद, ग्राहक हल्के वज़न के गहने और कम कैरेट वाले सोने के आभूषणों को प्राथमिकता दे रहे हैं। रिटेलर्स का कहना है कि पुराने सोने के बदले नए गहने खरीदने की 'एक्सचेंज स्कीम' अब कुछ इलाकों में 70% तक बिक्री का हिस्सा बन गई है, जो मौजूदा कीमतों के हिसाब से एक रणनीतिक बदलाव दिखाता है।
इन्वेस्टमेंट और ETF का हाल
सोने के बार, सिक्के और गोल्ड ईटीएफ (ETF) में निवेश की मांग इस तिमाही में 54 टन रही, जो पिछले तीन तिमाहियों की मज़बूत ग्रोथ के बाद थोड़ी कम हुई है। सोने के बार और सिक्कों की खरीद 19% घटी, क्योंकि खरीदारों ने कीमतों में तेज़ी के बाद सावधानी बरतनी शुरू कर दी। गोल्ड ईटीएफ में निवेश में भी मार्च तिमाही की तुलना में काफी कमी आई। इसके बावजूद, भारत ईटीएफ में सकारात्मक निवेश के साथ एक अपवाद बना हुआ है, जबकि अमेरिका और चीन जैसे बाज़ारों में निवेशकों ने पैसे निकाले हैं। जून के अंत तक, भारतीय गोल्ड ईटीएफ में कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
सप्लाई में कमी और इंपोर्ट ड्यूटी का असर
इस तिमाही में कुल सोने की उपलब्धता घटकर 120 टन के छह साल के निचले स्तर पर पहुंच गई। इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने के कारण सोने के इंपोर्ट में 53% की कमी आई, जो इस गिरावट का मुख्य कारण बना। इंपोर्ट कम होने के बावजूद, घरेलू बाज़ार में सोने की कोई कमी नहीं देखी गई, क्योंकि ऊंचे इन्वेंट्री स्तर और रिसाइकल किए गए सोने (recycled gold) की बढ़त ने मांग को पूरा करने में मदद की। कई ग्राहक अपना पुराना सोना सीधे बेचने के बजाय, लोन के लिए गिरवी रख रहे हैं, जिससे सोने का स्वामित्व बना हुआ है।
आगे चलकर, यह देखना होगा कि क्या रिसाइकल किए गए सोने और एक्सचेंज स्कीम का चलन सप्लाई का मुख्य ज़रिया बना रहता है। निवेशक इस बात पर नज़र रखेंगे कि क्या लगातार बढ़ती कीमतें मांग को दबाए रखती हैं, या आने वाले फेस्टिव सीजन में पारंपरिक खरीद पैटर्न में फिर से तेज़ी आती है।
