भारत में सोने के गहनों की मांग जून तिमाही में **15%** घटकर **75 टन** रह गई। ऊंची कीमतों के कारण यह गिरावट आई है। हालांकि, पहली छमाही (H1 2026) में सोने की मांग का कुल वैल्यू **$21 बिलियन** तक पहुंच गया, जो पिछले साल की समान अवधि से **26%** ज्यादा है। यह दिखाता है कि भले ही खरीद की मात्रा कम हुई है, लेकिन कीमतों में उछाल के कारण बाजार में पैसा पहले से ज्यादा लगा है।
सोने की मांग पर पड़ी महंगाई की मार
साल 2026 की दूसरी तिमाही (Q2) में भारत के गोल्ड मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। रिकॉर्ड कीमतों के चलते गहनों की मांग में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 15% की भारी गिरावट आई और यह 75 टन पर आ गई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी दौरान दुनियाभर में भी ज्वेलरी डिमांड में 17% की कमी देखी गई। ऊंचे दामों के चलते भारतीय ग्राहक अब हल्के वजन के गहने खरीदना पसंद कर रहे हैं।
थोड़ी रिकवरी और वैल्यू का खेल
साल-दर-साल के आंकड़ों में गिरावट दिख रही है, लेकिन पहली तिमाही (Q1 2026) की तुलना में भारतीय ज्वेलरी डिमांड में 14% की बढ़त दर्ज की गई है। यह घरेलू खरीद में मामूली सुधार का संकेत देता है। दिलचस्प बात यह है कि मांग की वैल्यू, यानी कितना पैसा खर्च हुआ, वह मात्रा से कहीं ज्यादा है। साल 2026 की पहली छमाही में भारतीय मांग का वैल्यू $21 बिलियन रहा, जो पिछले साल की पहली छमाही के मुकाबले 26% ज्यादा है। यह अंतर बताता है कि सोने की ऊंची कीमतों के कारण बाजार में कुल कैश फ्लो बढ़ा है।
ग्लोबल ट्रेंड और सेंट्रल बैंकों की भूमिका
वैश्विक स्तर पर, सोने की मांग में अब सिर्फ खुदरा ग्राहकों के बजाय संस्थागत खरीदारों का दबदबा दिख रहा है। दूसरी तिमाही में सेंट्रल बैंकों ने खूब सोना खरीदा, अपने रिजर्व में 289 टन का इजाफा किया, जो पिछले साल के मुकाबले 62% ज्यादा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस ट्रेंड में 200 किलोग्राम सोने का मामूली इजाफा करके योगदान दिया। हालांकि, गोल्ड-ईटीएफ (Gold-ETFs) के जरिए निवेश में 45 टन की गिरावट आई, लेकिन ओवर-द-काउंटर (OTC) मार्केट, जो बड़े संस्थागत और एशियाई निवेशकों द्वारा संचालित होता है, उसने 327 टन की मांग दर्ज कर बाजार को सहारा दिया।
निवेशकों के लिए जोखिम और ध्यान देने योग्य बातें
ज्वेलरी सेक्टर से जुड़े निवेशकों और कंपनियों के लिए सबसे बड़ा जोखिम कीमतों के प्रति ग्राहकों की संवेदनशीलता है। लगातार ऊंची कीमतें खुदरा बिक्री की मात्रा पर दबाव डाल सकती हैं, जिससे ज्वेलरी रिटेलर्स के रेवेन्यू ग्रोथ पर असर पड़ सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि ये कंपनियां इन्वेंटरी लागत का प्रबंधन कैसे करती हैं और क्या वे कम वजन या वैल्यू-इंजीनियर्ड प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ते ग्राहकों के बीच अपने प्रॉफिट मार्जिन को बनाए रख पाती हैं। आने वाले समय में प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि ग्राहक इन कीमतों के प्रति कैसा रुख अपनाते हैं और सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीद की रणनीति ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी और रियल यील्ड्स के जवाब में कैसे विकसित होती है।
