आयात पर लगी रोक हटी, बढ़ीं मुश्किलें
लगभग एक महीने के आयात पर लगी रोक अब खत्म हो गई है। बैंकों ने कस्टम पर 3% इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (IGST) का भुगतान करने पर सहमति जताई है। इस फैसले के बाद मई महीने में करीब 9 मीट्रिक टन सोना और 34 मीट्रिक टन चांदी का आयात क्लियर हो गया है।
घरेलू मांग में नरमी, डिस्काउंट पर मिल रहा सोना
हालांकि, देश के अंदर सोने की मांग अभी भी कमजोर बनी हुई है। यह कीमती धातु फिलहाल आधिकारिक घरेलू कीमतों पर $17 प्रति औंस तक के डिस्काउंट पर ट्रेड कर रही है। सोने का स्पॉट प्राइस करीब $4,728 प्रति औंस है, वहीं, भारतीय रुपया 0.01045 USD प्रति INR पर कारोबार कर रहा है।
ट्रेड डेफिसिट और रुपये पर पड़ेगा दबाव
आयात फिर से शुरू होने से भारत के लगातार बने हुए ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) के और बढ़ने की उम्मीद है। मार्च 2026 में यह घाटा $20.67 बिलियन था, और फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए वार्षिक घाटा $240.73 बिलियन रहने का अनुमान है। सोने का आयात इस कुल आयात बिल का लगभग 9% है। इन आयातों के लिए डॉलर की बढ़ी हुई मांग से भारतीय रुपये पर और अधिक दबाव पड़ेगा, जो पहले से ही एशिया की सबसे कमजोर करंसी में से एक है। ऐतिहासिक रूप से, बड़े पैमाने पर सोने के आयात ने रुपये के अवमूल्यन और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी के साथ सहसंबंध दिखाया है।
बदलता उपभोक्ता व्यवहार, निवेश की ओर झुकाव
घरेलू मांग का पैटर्न भी बदल रहा है। 2026 की पहली तिमाही में, सोने के गहनों की खपत में पिछले साल की तुलना में 19% की गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण पिछले साल की तुलना में 81% अधिक कीमतें हैं। उपभोक्ता तेजी से सोने की छड़ों, सिक्कों और ईटीएफ (ETFs) जैसे निवेश के साधनों की ओर रुख कर रहे हैं। अब सोने के गहनों की खपत से ज्यादा निवेश की मांग हो रही है। 2026 में भारत की कुल सोने की मांग घटकर 600-700 मीट्रिक टन तक गिर सकती है।
सरकार की चिंताएं और आयात की मजबूरी
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए सोने की खरीद सीमित करने की सार्वजनिक अपील के बावजूद, बैंकों द्वारा आयात फिर से शुरू करने का फैसला आपूर्ति बनाए रखने की एक अंतर्निहित आवश्यकता को दर्शाता है। यह देश की वित्तीय स्थिरता और भुगतान संतुलन की कीमत पर हो सकता है। भारत की सोने के आयात पर संरचनात्मक निर्भरता, जो कच्चे तेल के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयात आइटम है, लगातार कमजोरी पैदा करती है। इन आयातों से विदेशी मुद्रा भंडार की निकासी ने ऐतिहासिक रूप से मुद्रा संकट को जन्म दिया है और महत्वपूर्ण सरकारी हस्तक्षेपों को प्रेरित किया है।
ज्वैलरी कारोबार पर असर और भविष्य की राह
ज्वैलरी व्यवसायों को सोर्सिंग लागत में वृद्धि और उपभोक्ताओं की कम मूल्य वाले उत्पादों के प्रति वरीयता में बदलाव का सामना करना पड़ रहा है। इन बढ़ी हुई लागतों को उपभोक्ताओं पर पूरी तरह से न डाल पाने से इन व्यवसायों के लाभ मार्जिन पर असर पड़ने की संभावना है। भविष्य को देखते हुए, भारत की सोने की मांग कमजोर बनी रहने की उम्मीद है। भारतीय रुपया क्षेत्रीय साथियों जैसे मलेशियाई रिंगित (Malaysian Ringgit) और चीनी युआन (Chinese Yuan) की तुलना में खराब प्रदर्शन कर रहा है। रुपये और ट्रेड डेफिसिट पर निरंतर दबाव नीति निर्माताओं और निवेशकों के लिए भुगतान संतुलन की इन चुनौतियों से निपटने के दौरान प्रमुख चिंताएं बने रहने की संभावना है।
