निवेशकों का बदला मूड: क्यों घटाई सोने में हिस्सेदारी?
मार्च 2026 का महीना भारतीय गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) के लिए मायूसी भरा रहा। भले ही दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिकी-ईरानी संघर्ष (US-Iran conflict) जैसी खबरें सुर्खियां बटोर रही थीं, निवेशकों ने सोने जैसे पारंपरिक सुरक्षित निवेश (safe haven) की ओर से अपना रुख मोड़ लिया। इस दौरान घरेलू सोने की कीमतों में भी 11% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। गौर करने वाली बात यह है कि यह गिरावट निफ्टी 50 (Nifty 50) इक्विटी बेंचमार्क के प्रदर्शन के साथ-साथ चली, जो बताता है कि निवेशक सिर्फ सोने से ही नहीं, बल्कि इक्विटी सहित अन्य एसेट्स से भी पैसा निकाल रहे थे।
मार्च में हुई भारी निकासी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मार्च 2026 में गोल्ड ईटीएफ में कुल शुद्ध निवेश (net inflows) 57% घटकर ₹2,266 करोड़ रह गया। यह फरवरी 2026 के ₹5,255 करोड़ के आंकड़े से काफी कम है। हालांकि, गोल्ड ईटीएफ के एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹1.71 लाख करोड़ पर बने रहे, लेकिन यह आंकड़ा जमा हुई वैल्यू और पिछली बढ़त को दर्शाता है, न कि नए निवेश को।
ग्लोबल ट्रेंड्स और भारत का अलग नज़रिया
यह 'रिस्क-ऑफ' सेंटिमेंट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं था। वैश्विक स्तर पर मार्च 2026 में गोल्ड ईटीएफ से रिकॉर्ड $12 बिलियन की निकासी देखी गई, जिसमें उत्तरी अमेरिका सबसे आगे था। इसने उत्तरी अमेरिका में लगातार नौ महीने के इनफ्लो का सिलसिला तोड़ दिया। हालांकि, एशियाई गोल्ड ईटीएफ में मजबूत इनफ्लो जारी रहा, जो 2026 की पहली तिमाही में $14 बिलियन रहा। भारत ने इस तिमाही में $3 बिलियन का योगदान दिया, जिसमें मार्च अकेले $177 मिलियन था। यह अंतर दिखाता है कि कैसे एशियाई निवेशक, खासकर भारत से, वैश्विक घटनाओं पर अलग तरह से प्रतिक्रिया दे रहे थे।
रुपये की गिरावट और शेयर बाज़ार की अपील
मार्च 2026 में भारतीय रुपये (Indian Rupee) में भी भारी गिरावट आई और यह ₹93.81 प्रति अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया। आमतौर पर, कमजोर रुपया सोने की कीमतों को बढ़ाता है क्योंकि आयातित सोना महंगा हो जाता है। लेकिन इस बार, सोने की कीमतों में गिरावट ने दिखाया कि ग्लोबल लिक्विडिटी कंडीशंस (global liquidity conditions) और एसेट्स से पैसे निकालने की व्यापक प्रवृत्ति, रुपये के कमजोर होने के असर पर हावी हो गई।
फरवरी 2026 में भी इनफ्लो में कमी देखी गई थी, जिसका एक कारण निवेशकों द्वारा पिछले रैली में मुनाफावसूली (profit taking) और शेयर बाज़ार में आकर्षक खरीदारी के अवसर (buying opportunities) दिखना था।
बढ़ती ब्याज दरें और गोल्ड का 'सेफ हेवन' स्टेटस
एक और अहम वजह रही अमेरिकी 10-साल ट्रेजरी यील्ड (US 10-year Treasury yield) का बढ़ना। मार्च 2026 के अंत तक यह 4.38% पर पहुँच गया, जो जुलाई 2025 के बाद का उच्चतम स्तर था। इसका मतलब है कि ग्लोबल मॉनेटरी कंडीशंस (monetary conditions) और सख्त हो रही हैं, जिससे सोने जैसी नॉन-इंटरेस्ट बेयरिंग एसेट्स को होल्ड करना महंगा हो जाता है।
'सेफ हेवन' क्यों हुआ फेल?
हालांकि सोने को पारंपरिक रूप से 'सुरक्षित पनाहगाह' माना जाता है, लेकिन मार्च 2026 में बड़ी निकासी और कीमतों में गिरावट ने इसकी कमजोरियों को उजागर किया। वैश्विक वित्तीय बाजारों की बढ़ती interconnectedness का मतलब है कि व्यापक डर या कैश की किल्लत के समय 'सेफ' माने जाने वाले एसेट्स भी बेचे जा सकते हैं।
आगे कैसा रहेगा सोने का रुख?
अप्रैल 2026 के लिए सोने की कीमतों में अस्थिरता (volatility) बने रहने की उम्मीद है। भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और सेंट्रल बैंक की कार्रवाइयां कीमतों को प्रभावित करेंगी। भारत में, अगर रुपया कमजोर बना रहा तो साल के अंत तक सोने की कीमतें ₹2 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुँच सकती हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) के अनुसार, मार्च की निकासी रिकॉर्ड मासिक आउटफ्लो थी। हालाँकि, एशियाई ईटीएफ में लगातार निवेश भारत जैसी जगहों से मांग का संकेत देता है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) का 4% के मुद्रास्फीति लक्ष्य (inflation target) पर फोकस अपनी जगह है, लेकिन ऊर्जा लागत और करेंसी के असर से आने वाले अल्पकालिक महंगाई के दबावों पर नजर रखनी होगी।