वैल्यूएशन का खेल
पिछले बारह महीनों से लगातार जमा हो रहे गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में हालिया गिरावट एक बड़ा बदलाव है। मई में 0.4 मीट्रिक टन होल्डिंग्स की बिक्री करके निवेशकों ने घरेलू कीमतों में आई उछाल और सरकारी दखलअंदाजी, दोनों का जवाब दिया। मई के मध्य में जब सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी को 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया, तो तुरंत स्थानीय सोने की कीमतें 164,497 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुँच गईं। बाज़ार के जानकारों ने इस बढ़ोतरी को मुनाफा कमाने का एक बढ़िया मौका समझा, न कि किसी बड़ी तेजी का संकेत। इससे भारतीय खुदरा और संस्थागत निवेशकों की कीमतों के प्रति संवेदनशीलता साफ दिखती है।
मैक्रो इकोनॉमी का कनेक्शन
इस निकासी को अगर गहराई से देखें, तो यह भारत के ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) को समझने में मदद करती है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े सोने के उपभोक्ता के तौर पर, भारत की सोने की मांग विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर डालती है। इस मांग में कमी से रुपये को मजबूती मिल सकती है, जो इस तिमाही में डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हुआ है। हालांकि, करेंसी को स्थिर रखने के लिए ड्यूटी बढ़ाना एक दोधारी तलवार की तरह है। यह जहां ट्रेड इम्बैलेंस को कम करता है, वहीं अगर सोने का आयात बहुत महंगा हो जाए तो यह एक समानांतर 'ग्रे मार्केट' (Grey Market) को भी जन्म दे सकता है। इससे बैलेंस ऑफ पेमेंट्स पर इन सरकारी उपायों का असर कम हो सकता है।
अंदरूनी जोखिम और मंदी का अनुमान
सोने को एक सुरक्षित निवेश मानने की धारणा फिलहाल मुश्किल में है। पुराने आंकड़े बताते हैं कि जब खुदरा निवेशक कीमतों के चरम पर ईटीएफ (ETF) से व्यवस्थित रूप से बाहर निकलने लगते हैं, तो अक्सर इसके बाद बाज़ार में स्थिरता या गिरावट का दौर आता है। फिजिकल सोने के विपरीत, जिसका लंबे समय तक वैल्यू स्टोर (Store of Value) के रूप में इस्तेमाल होता है, ईटीएफ (ETF) को घरेलू बाज़ार में अब छोटे अवधि के ट्रेडिंग इंस्ट्रूमेंट (Trading Instrument) की तरह देखा जा रहा है। इस व्यवहार में बदलाव से निवेशकों को ज़्यादा अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, इस साल अब तक 3.48 बिलियन डॉलर का निवेश बताता है कि कई निवेशक अभी भी नुकसान में हैं या मामूली मुनाफे पर फंसे हुए हैं। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रहा, तो घरेलू सोने की कीमतें कृत्रिम रूप से ऊंची बनी रह सकती हैं, जिससे और भी निकासी हो सकती है, अगर निवेशक पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (Portfolio Diversification) के बजाय लिक्विडिटी (Liquidity) को प्राथमिकता देते हैं।
भविष्य का नज़ारा
बाज़ार की भावना अभी भी सतर्क है क्योंकि ट्रेडर्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मई की यह निकासी सिर्फ मुनाफा वसूली का मामला है या फिर किसी बड़े संस्थागत बदलाव की शुरुआत। ब्रोकरेज फर्मों का विश्लेषण बताता है कि भविष्य की मांग, स्थानीय सरकारी फैसलों के बजाय ग्लोबल स्पॉट कीमतों (Global Spot Prices) के रुझान से तय होगी। अगर मौजूदा कीमतों का यह सिलसिला जारी रहा, तो घरेलू बाज़ार में ईटीएफ (ETF) की मात्रा में और कमी आ सकती है, जिससे यह सेक्टर एक ग्रोथ-हेवी माहौल से निकलकर टैक्टिकल ट्रेडिंग (Tactical Trading) और हाई-फ्रीक्वेंसी वोलेटिलिटी मैनेजमेंट (High-Frequency Volatility Management) वाले दौर में प्रवेश कर सकता है।
