साल 2026 में भारत में सोने की खपत गिरकर **650 मीट्रिक टन** के 6 साल के निचले स्तर पर आने का अनुमान है। रिकॉर्ड तोड़ कीमतों और कमजोर ग्रामीण आय के चलते बाजार में बड़ी सुस्ती देखी जा रही है।
बाजार में क्या बदल रहा है?
सोने की खपत में गिरावट के बीच खरीदारी के पैटर्न में बड़ा बदलाव दिख रहा है। अब ग्राहक भारी-भरकम पारंपरिक गहनों के बजाय हल्के गहनों और 'लैब-ग्रोन डायमंड्स' को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके अलावा, निवेशक अब सोने को सिर्फ आभूषण के तौर पर नहीं, बल्कि महंगाई से सुरक्षा (Hedge) के लिए 'गोल्ड ईटीएफ' (Gold ETFs), सिक्के और बार के रूप में पसंद कर रहे हैं।
लिस्टेड रिटेलर्स पर असर
ज्वेलरी रिटेलर्स के लिए चुनौती बड़ी है। हालांकि भौतिक मात्रा में दोहरे अंकों की गिरावट आई है, लेकिन सोने की प्रति यूनिट कीमत बढ़ने के कारण बड़ी कंपनियों का रेवेन्यू अभी भी टिका हुआ है। अब देखना यह है कि क्या ये कंपनियां ऊंचे दाम वाले आइटम्स बेचकर अपने मार्जिन को बरकरार रख पाती हैं या डिमांड बढ़ाने के लिए उन्हें भारी डिस्काउंट का सहारा लेना पड़ेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट
भारत की कुल गोल्ड डिमांड में ग्रामीण इलाकों की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा है। इस बार मानसून के कमजोर रहने से किसानों की खर्च करने की क्षमता घटी है, जिसका सीधा असर ज्वैलरी मार्केट पर पड़ा है। इसके ऊपर से इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी और सरकारी नियमों ने बाजार में लिक्विडिटी को और धीमा कर दिया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
वेडिंग सीजन के बावजूद सोने की ऊंची कीमतें खरीदारों को दूर रख रही हैं। आने वाले महीनों में सरकारी इंपोर्ट नीतियों में बदलाव और रुपया (Rupee) की चाल तय करेगी कि क्या फिजिकल गोल्ड की मांग फिर से पटरी पर आएगी या ऊंची कीमतों का दबाव बना रहेगा।
