ओएमसी (OMC) पर टूटा मर्ज!
भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) इस वक्त भारी वित्तीय दबाव में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये कंपनियां प्रतिदिन ₹1,000 करोड़ तक का भारी नुकसान उठा रही हैं। इसकी सीधी वजह है ग्लोबल कच्चे तेल के बाजार में आई भयंकर तेजी। भू-राजनीतिक कारणों से ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतों में फरवरी के अंत से 50% से ज्यादा का इजाफा हुआ है, जिसने ओएमसी को मौजूदा बाजार लागत से कम कीमत पर फ्यूल बेचने पर मजबूर कर दिया है।
मार्जिन पर गहराए बादल
ओएमसी का मुनाफा मार्जिन बुरी तरह सिकुड़ गया है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 87 पैसे बढ़कर ₹98.64 प्रति लीटर हो गई, जबकि डीजल 91 पैसे बढ़कर ₹91.58 प्रति लीटर पर पहुंच गया। मुंबई में भी पेट्रोल 91 पैसे महंगा होकर ₹107.59 प्रति लीटर और डीजल 94 पैसे बढ़कर ₹94.08 प्रति लीटर हो गया। यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर आयातित कच्चे तेल की बढ़ती लागत का नतीजा है, जो अमेरिका-ईरान संघर्ष जैसी भू-राजनीतिक घटनाओं से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। ब्रेंट क्रूड के फ्यूचर $111 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहे हैं, जो मौजूदा जोखिमों को दर्शाता है।
ग्लोबल ऑयल का भारतीय उपभोक्ताओं पर असर
भारत में फ्यूल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव, कच्चे तेल की ग्लोबल कीमतों, रुपये-डॉलर के एक्सचेंज रेट, सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी और राज्य के वैट (VAT) जैसे कई कारकों पर निर्भर करती हैं। ब्रेंट क्रूड में भू-राजनीतिक तनाव के कारण आई तेजी ही घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है, जिससे कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी $104 प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है।
आयात पर निर्भरता और सब्सिडी की चिंता
भारत कच्चे तेल के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिसके कारण वह कीमतों के उतार-चढ़ाव और मुद्रा में कमजोरी के प्रति संवेदनशील है। यह स्थिति ओएमसी को ग्लोबल प्राइस शॉक के प्रति अधिक जोखिम भरा बनाती है, जिसके लिए सरकारी हस्तक्षेप या कीमतों में और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं की मांग घट सकती है और महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। अगर टैक्स में कमी किए बिना ग्लोबल कीमतें बढ़ती रहीं, तो ओएमसी का घाटा बढ़ सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिरता और निवेश क्षमता पर असर पड़ेगा। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हार्डदीप सिंह पुरी ने पहले भी कहा है कि ओएमसी बाजार दरों से कम पर फ्यूल बेचने पर प्रतिदिन ₹1,000 करोड़ तक का नुकसान झेल सकती हैं।
आगे की राह कैसी?
घरेलू फ्यूल की कीमतों का भविष्य काफी हद तक कच्चे तेल की ग्लोबल चाल और भू-राजनीतिक विकास पर निर्भर करेगा। अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं और रुपया कमजोर हुआ, तो खुदरा कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। इसके विपरीत, तनाव कम होने या ग्लोबल सप्लाई बढ़ने से कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, मौजूदा बाजार के हालात तंग सप्लाई की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि निकट और मध्यम अवधि में उपभोक्ताओं को ऊंची फ्यूल कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।
