ग्लोबल रिफाइनरी में आ रही बाधाओं के कारण दुनिया भर में सल्फर की भारी कमी हो गई है। इसका सीधा असर अब भारत की फर्टिलाइजर कंपनियों के रॉ-मटेरियल कॉस्ट पर पड़ रहा है।
मिडल ईस्ट और रूस में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण रिफाइनरियों का काम प्रभावित हुआ है, जिससे सल्फर की सप्लाई चेन बुरी तरह टूट गई है। सल्फर का इस्तेमाल न केवल फर्टिलाइजर बनाने में होता है, बल्कि अब इसकी डिमांड इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरी सेक्टर में भी बढ़ गई है। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग हब सल्फर को बैटरी ग्रेड मटेरियल के लिए प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे उर्वरक उद्योग के लिए कच्चा माल महंगा हो रहा है।\n\nभारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट करता है, इसलिए इसका असर Coromandel International, Paradeep Phosphates और Chambal Fertilisers जैसी दिग्गज कंपनियों पर सीधा पड़ सकता है। ये कंपनियां फॉस्फोरिक एसिड और रॉक फॉस्फेट जैसे रॉ-मटेरियल्स के लिए वैश्विक आपूर्ति पर निर्भर हैं।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?\nनिवेशकों के लिए मुख्य चिंता ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) को लेकर है। कंपनियों के सामने अब दोहरी चुनौती है: या तो वे खुद महंगी लागत का बोझ उठाएं, जिससे उनका मुनाफा घटेगा, या फिर कीमतों में इजाफा करें। लेकिन भारत के कृषि बाजार में प्राइस सेंसिटिविटी को देखते हुए दाम बढ़ाना सरकार की सब्सिडी नीति के कारण काफी चुनौतीपूर्ण होता है।\n\nअगली कुछ तिमाहियों में निवेशकों को सल्फर की ग्लोबल स्पॉट कीमतों और कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर कड़ी नजर रखनी होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनियां इस सप्लाई चेन के संकट को कैसे मैनेज करती हैं और क्या वे अपने फाइनेंशियल परफॉरमेंस को बरकरार रख पाती हैं या नहीं।
