भारत में एथेनॉल का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, लेकिन घरेलू मांग उम्मीद से काफी पीछे है। प्रोडक्शन कैपेसिटी **20 अरब लीटर** सालाना के पार जाने के बावजूद, घरेलू खपत सिर्फ **11 अरब लीटर** के आसपास है। इस बड़े गैप के चलते अब **7 अरब लीटर** एथेनॉल का सरप्लस हो गया है, और डिस्टिलरीज अपनी कुल क्षमता का केवल **60%** ही इस्तेमाल कर पा रही हैं।
एथेनॉल सेक्टर में बम्पर प्रोडक्शन, पर खपत कम
सरकार की E20 फ्यूल प्रोग्राम, जिसमें पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य है, के बावजूद भारत का एथेनॉल सेक्टर इस समय भारी ओवरसप्लाई (Oversupply) से जूझ रहा है। एथेनॉल बनाने की सालाना क्षमता 20 अरब लीटर से भी ऊपर निकल गई है, लेकिन घरेलू मांग इस रफ्तार से बढ़ नहीं पा रही है। E20 प्रोग्राम के तहत अभी हर साल करीब 11 अरब लीटर एथेनॉल की खपत हो रही है, जो उत्पादन क्षमता से काफी कम है।
डिस्टिलरीज पर मंडराया खतरा, घट रहा इस्तेमाल
इस सप्लाई-डिमैंड (Supply-Demand) के मिसमैच के कारण, भारत की डिस्टिलरीज अपनी कुल कैपेसिटी का केवल 60% ही इस्तेमाल कर पा रही हैं। हालात यह हैं कि E20 फ्यूल को लेकर कुछ उपभोक्ताओं में हिचकिचाहट भी देखी जा रही है, जिससे भविष्य की मांग पर सवाल खड़ा हो गया है। हालांकि, फ्यूल सेक्टर के अलावा फार्मा, इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) और कॉस्मेटिक्स जैसे सेक्टर में एथेनॉल की मांग बनी हुई है। खासकर, लिकर और अन्य इंडस्ट्रियल इस्तेमाल में आने वाले एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (Extra Neutral Alcohol) की मांग 2025 तक 3.8 अरब लीटर तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन यह मांग भी इंडस्ट्री के कुल अतिरिक्त स्टॉक को खपाने के लिए नाकाफी साबित हो रही है।
एक्सपोर्ट पर पाबंदी और एक्सपोर्ट के रास्ते?
इस भारी सरप्लस से निपटने के लिए, ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (All India Distillers' Association) जैसी इंडस्ट्री बॉडीज सरकार से एथेनॉल को नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों में एक्सपोर्ट (Export) करने की इजाजत मांग रही हैं। इन देशों में भी एथेनॉल की मांग है, लेकिन वे खुद इसका उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। फिलहाल, सरकारी नीतियों के चलते एथेनॉल एक्सपोर्ट पर कड़े नियम हैं। गन्ने, मक्के या अनाज से बनने वाले फर्स्ट-जेनरेशन (First-Generation) एथेनॉल का एक्सपोर्ट पूरी तरह बैन है। सितंबर 2025 के बाद केवल दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल, जो फसल अवशेषों और बायोमास से बनता है, को ही एक्सपोर्ट करने की अनुमति होगी। इस वजह से, मौजूदा एक्सपोर्ट वॉल्यूम काफी सीमित है और मुख्य रूप से कुछ अफ्रीकी देशों और छोटे पड़ोसी देशों तक ही सीमित है।
नए बायोफ्यूल्स की ओर बढ़ रहा इंडस्ट्री का रुख
एथेनॉल की इस बड़ी सरप्लस स्थिति से निपटने के लिए, इंडस्ट्री के कुछ बड़े प्लेयर्स अब एडवांस्ड बायोफ्यूल्स (Advanced Biofuels) जैसे नए प्रोडक्ट्स की ओर रुख कर रहे हैं, ताकि अपने इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर इस्तेमाल कर सकें। Praj Industries जैसी कंपनियां अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में विविधता ला रही हैं। Praj Industries के मैनेजमेंट ने बताया है कि वे बायो-आइसोब्यूटेनॉल (Bio-isobutanol) का कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू करने की दिशा में बढ़ रहे हैं, और फाइनेंशियल ईयर 27 की इसी तिमाही में इसका पहला ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। यह कदम इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा स्ट्रेटेजिक (Strategic) बदलाव है, जो उन्हें सैचुरेटेड (Saturated) हो चुके एथेनॉल मार्केट पर निर्भरता कम करने और ज्यादा वैल्यू वाले प्रोडक्ट्स पर फोकस करने में मदद करेगा। आगे चलकर, एक्सपोर्ट पॉलिसी में ढील और नए जेनरेशन बायोफ्यूल्स को अपनाने की रफ्तार, भारतीय डिस्टिलरी कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) और कैपेसिटी यूटिलाइजेशन (Capacity Utilisation) के लिए अहम साबित होगी।
