यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर की कमोडिटी मार्केट (Commodity Market) पहले से ही दबाव में है। भारत सरकार बढ़ती कीमतों और सप्लाई की स्थिरता को लेकर चिंतित है। इस कदम से चीन के सल्फ्यूरिक एसिड (Sulphuric Acid) के एक्सपोर्ट बैन और मध्य पूर्व (Middle East) में शिपिंग रूट (Shipping Route) पर चल रहे व्यवधानों के बीच स्थिति और बिगड़ सकती है।
सप्लाई संकट गहराने का डर:
भारत की ओर से सल्फर एक्सपोर्ट रोकने की संभावना, ग्लोबल सप्लाई में पहले से मौजूद कमी को और बढ़ा सकती है। चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा सल्फ्यूरिक एसिड उत्पादक है, मई 2026 तक एक्सपोर्ट रोकने की योजना बना रहा है। इससे 46 लाख टन की कमी आ सकती है और 28 लाख टन का घाटा होने का अनुमान है। तुर्की ने भी 7 अप्रैल, 2026 से Q3 2026 तक घरेलू बाजार को बचाने के लिए सल्फर एक्सपोर्ट पर बैन लगाया है, जिससे ग्लोबल सप्लाई और टाइट हो गई है। यह सब फरवरी 2026 के अंत में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के बीच हो रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे अहम शिपिंग रूट पर बड़ी रुकावटें आई हैं, जिससे ग्लोबल सल्फर और तेल शिपमेंट का 20-45% प्रभावित हुआ है। नतीजतन, पिछले महीने ग्लोबल सल्फर की कीमतें 40% बढ़ी हैं, जबकि सल्फ्यूरिक एसिड की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 50% से ज्यादा उछली हैं। 2025 में ग्लोबल सल्फर प्रोडक्शन करीब 84 मिलियन टन था, जिसमें मध्य पूर्व एक बड़ा सप्लायर है।
घरेलू जरूरतें और दुनिया पर असर:
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता अपने एग्रीकल्चर सेक्टर (Agriculture Sector) के लिए कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित करना है। सल्फर, अमोनियम सल्फेट (Ammonium Sulphate), सिंगल सुपरफॉस्फेट (SSP) और डीएपी (DAP) जैसे फर्टिलाइजर्स (Fertilizers) का मुख्य घटक है। भारत अपनी सालाना सल्फर की जरूरत का आधे से ज्यादा, यानी करीब 20 लाख मीट्रिक टन, इंपोर्ट (Import) करता है। इसमें से करीब 50% परंपरागत रूप से कतर, यूएई और ओमान जैसे मध्य पूर्वी देशों से आता है। हालांकि भारत सालाना करीब 8 लाख टन सल्फर एक्सपोर्ट करता है, जिसका बड़ा हिस्सा चीन को जाता है, लेकिन इस एक्सपोर्ट को सीमित करने से घरेलू फर्टिलाइजर सप्लाई को बढ़ावा मिलेगा। सरकार ने पहले ही स्थानीय ऑयल रिफाइनरियों को फर्टिलाइजर कंपनियों को पहले सप्लाई देने का निर्देश दिया है। इस महत्वपूर्ण सामग्री में किसी भी रुकावट का मतलब भारतीय किसानों के लिए फर्टिलाइजर की ऊंची कीमतें हो सकती हैं, जिससे खरीफ की बुवाई से पहले फसल की पैदावार और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। भारत का फर्टिलाइजर उद्योग, जो सरकारी सब्सिडी और घरेलू उत्पादन प्रयासों से मजबूत मांग देख रहा है, इनपुट कीमतों में बढ़ोतरी से भारी लागत दबाव का सामना कर रहा है। 2024 में, भारत ने लगभग 118 मिलियन डॉलर का सल्फ्यूरिक एसिड इंपोर्ट किया, जो अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर अपनी निर्भरता को दर्शाता है।
व्यापक मार्केट की चिंताएं:
दुनिया भर की सप्लाई चेन (Supply Chains) इतनी आपस में जुड़ी हुई हैं कि भारत का संभावित एक्सपोर्ट प्रतिबंध, जो घरेलू राहत के लिए है, एक व्यापक संकट खड़ा कर सकता है। टाइट सल्फर मार्केट माइनिंग सेक्टर (Mining Sector) के लिए एक बड़ी चिंता है, जो तांबा (Copper) और निकल (Nickel) जैसी धातुओं को निकालने के लिए सल्फ्यूरिक एसिड का भारी उपयोग करता है। चिली, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और जाम्बिया के प्रमुख कॉपर उत्पादकों के साथ-साथ इंडोनेशिया में निकल ऑपरेशंस पहले से ही कठिन प्रतिस्पर्धा और महंगी एसिड का सामना कर रहे हैं। AI इंफ्रास्ट्रक्चर और इलेक्ट्रिफिकेशन के कारण कॉपर की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे 2026 की शुरुआत में कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, और आगे बढ़ोतरी की उम्मीद है। निकल इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिसे अमेरिकी सरकार की 'प्रोजेक्ट वॉल्ट' जैसी पहलें उजागर करती हैं। दक्षिणी कॉपर (Southern Copper) और वेले (Vale) जैसी कंपनियां इस चुनौतीपूर्ण सप्लाई माहौल में काम कर रही हैं। भारत का अपना सल्फर एक्सपोर्ट, जिसका मूल्य 2024 में 94.8 मिलियन डॉलर था और मुख्य रूप से चीन को जाता था, वह भी कट जाएगा, जिससे व्यापार प्रभावित होगा। भारत का एक प्रमुख सल्फर स्रोत मध्य पूर्व, ग्लोबल प्रोडक्शन का लगभग 25% है और वह अपनी कठिनाइयों का सामना कर रहा है। संघर्ष से संबंधित व्यवधानों ने पहले ही शिपिंग और बीमा लागत बढ़ा दी है, जिससे कच्चे माल की अंतिम कीमत बढ़ गई है। 2025 के अंत में ग्लोबल सल्फर की कीमतें लगभग $428.67/MT से $448.00/MT के बीच थीं, जबकि फरवरी 2026 में भारत की CIF कीमत लगभग $643.00/MT थी। इन कीमतों में मौजूदा एक्सपोर्ट बैन और भू-राजनीतिक जोखिमों के साथ तेजी से वृद्धि की उम्मीद है।
भविष्य का दृष्टिकोण:
चीन और तुर्की जैसे प्रमुख सप्लायर्स से एक्सपोर्ट बैन, जारी भू-राजनीतिक संघर्ष, और एग्रीकल्चर और नए एनर्जी सेक्टर से मजबूत मांग को देखते हुए, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की कीमतें कुछ समय तक ऊंची बने रहने की उम्मीद है। भारत की एक्सपोर्ट पॉलिसी पर फैसला, इन कीमतों और फर्टिलाइजर्स व इंडस्ट्रियल मेटल्स के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन की स्थिरता को आकार देने में महत्वपूर्ण होगा। विश्लेषकों का अनुमान है कि इन सप्लाई व्यवधानों और बदलती मांग से प्रभावित होकर आने वाले समय में सप्लाई टाइट और कीमतें मजबूत बनी रहेंगी।